Maharana Pratap · July 22, 2016 2,676

अकबर का चितौड़गढ़ में आक्रमण

जब प्रताप 14 वर्ष के थे तब मुहम्मद जल्लालुद्दीन अकबर ने 13 वर्ष की उम्र में दिल्ली का सम्राट बना. उस समय वो बहुत छोटा था इसलिए बैरम खान की संरक्षण में वो दिल्ली की राजगद्दी संभाला. राजपूताने को जीतना शुरू से ही उसकी ख्वायिश थी. सम्राट बनते ही उसने आमेर के कछावा राजाओं से संधि कर ली और फिर शीघ्र ही महाराणा उदय सिंह के पास प्रस्ताव भेज दिया की वो मुग़ल-सत्ता की अधीनता को स्वीकार कर ले. महाराणा उदय सिंह ने इस संधि का जवाब बहुत ही कड़े शब्दों में दिया और जवाब में लिख दिया की हम कभी किसी विदेशी ताकत के आगे नहीं झुक सकते है. इससे क्रोधित होकर अकबर ने 20 अक्टूबर सन 1567 एक बड़ी विशाल सेना लेकर बैरम खान के नेतृत्व में चितौड़ पर आ धमका. चितौड़ को मुग़ल सेना ने चारों ओर से घेर लिया गया इसके बावजूद मुग़ल सेना चितौड़ के अन्दर न घुस पायी, मैं आपको बता देना चाहूँगा की चितौड़ का किला सबसे बड़ा किला माना जाता है. 6 महीने तक महाराणा उदय सिंह, प्रताप और समस्त चितौड़गढ़ के सेना ने बड़े ही वीरता के साथ मुगलों को सामना किया. परन्तु राशन पानी बंद हो जाने के कारण उदय सिंह मुगलों का ज्यादा देर तक सामना न कर सके लगभग 6 महीने की भीषण संग्राम के बाद 23 फरवरी को उदय सिंह को समस्त परिवार के साथ चितौड़ छोड़ना पड़ा, उन्होंने पहाड़ियों से घिरे सुरम्य स्थल उदयपुर को अपनी राजधानी बनाया और फिर वहीँ रहने लगे.
एक दिन महाराणा उदयसिंह अपने पुत्र प्रताप के साथ उदयपुर की वादियों में टहलने निकले दोनों सफ़ेद घोड़े पर सवार थे. महाराणा उदय सिंह का शरीर ज्यादा स्वस्थ नहीं दिखाई दे रहा था, वो लम्बे समय से बीमार थे, चितौड़गढ़ में अकबर का कब्ज़ा, राजपूतानियों का जौहर, और 30,000 मासूम नागरिकों की निर्मम हत्या ने उदय सिंह को अन्दर से झकझोर दिया था,जिसका इतिहास उदय सिंह के चेहरे में साफ़ साफ़ देखा जा सकता था. प्रताप युवा थे, प्रदीप्त सूर्य की तरह उनका चेहरा दैदीप्यमान था. घोड़े पर सवार कुंवर प्रताप साक्षात् देव लग रहे थे. घने जंगल में उदय सिंह ने अपना घोडा रोका और उतर गए, प्रताप भी घोड़े से उतर गए. उदयसिंह ने सूर्य की किरणों को देखते हुए कहा की हम राजपूतों का जीवन मातृभूमि की रक्षा करने के लिए होता है, हम इसकी रक्षा अपने प्राण का न्योछावर कर के भी करते है, तुम जानते हो की मुग़ल सम्राट अकबर की नजर पुरे मेवाड़ में है. इसपर प्रताप ने कहा की आप चिंता न करे पिताजी आपके पुत्र प्रताप की भुजा में इतनी शक्ति है की वो हर उस शत्रु का सामना कर सकता है जो मेवाड़ पर अपनी बुरी दृष्टी डालेगा. इसपर उदयसिंह ने कहा की मुझे मालूम है बेटे, पर आजकल हम राजपूतों का दिन कुछ अच्छा नहीं रहा है, राजपूताने के कई राज्य अकबर से जा मिले है, और तुम्हारा बूढ़ा पिता भी अपने कई नागरिकों को नहीं बचा पाया, प्रताप ने कहा की आप धैर्य रखिये पिताजी मैं प्रण करता हूँ की जब तक मैं शत्रु से उस महाविनाश का बदला नहीं ले लूँगा, तब तक चैन से नहीं बैठूँगा. इसे देख कर उदय सिंह के आँखों में आंसू आ गए, उन्होंने कहा की पर “प्रताप तुम्हारे छोटे भाई जगमाल और शक्ति सिंह दोनों ही तुमसे आयु के साथ साथ बुद्धि में भी छोटे है मुझे दर है की कहीं मेरी मृत्यु के बाद शिशोदिया वंश…….” प्रताप ने कहा की नहीं नहीं पिताजी मैं अपने विवेक के साथ उन दोनों को अपने साथ बांधने का प्रयत्न करूँगा. उदय सिंह की हालत अब और भी खराब हो गयी थी वो अपने घोड़े पर बैठे और वापस अपने महल की ओर वापस चले गए.
महल पहुँचने पर छोटी रानी भटियानी ने उदय सिंह का स्वागत किया और उन्हें अपने कक्ष में ले गयीं. और वहां पर उन्होंने अपने छोटे बेटे जगमाल को राजा बनानें की इच्छा व्यक्त कर दी. उदय सिंह को पहले से ही यह एहसास था की छोटी रानी जगमाल को राजा बनाना चाहती है, परन्तु आज छोटी रानी ने उदय सिंह को इस प्रकार से घेर लिया था की उससे उनका चैन और सुख जाता रहा, वे परेशान हो गए और अंततः जगमाल को उतराधिकारी घोषित करना पड़ा. उसके उतराधिकारी बनने के कुछ दिन बाद ही महाराणा उदय सिंह स्वर्ग सिधार गए. जिसने भी यह सुना की जगमाल मेवाड़ का उतराधिकारी है वह उदय सिंह की आलोचना करने लगा. सारे प्रजा में निराशा की लहर दौड़ गयी. परन्तु प्रताप ने इसका जरा भी विरोध नहीं किया उन्होंने अपने पिता के फैसले का सम्मान किया और जगमाल को मेवाड़ का नया राणा बनने में ख़ुशी जाहिर किया.
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