Prithviraj Chauhan · July 23, 2016 1,830

अध्यपतन

जब पृथ्वीराज संयोगिता को भगा कर दिल्ली ले आये तब वे एकदम से संयोगितामय हो गए,वे उनके प्रेम में बिलकुल ही मुग्ध हो गए,उनके सौन्दर्य जाल में फंसकर पृथ्वीराज ने राज्य का निरिक्षण छोड़ दिया, दरबार में आना जाना छोड़ दिया, अपने वीरों के साथ बातचीत बंद कर दी और दिन भर संयोगिता के साथ महल में रहने लगे, प्रजा अपने राजा की दर्शन को न पाकर हाहाकार मचने लगी. राज्य का भर जैतसिंह को मिला था. हालाँकि जैत सिंह एक बहदूर मनुष्य थे पर इससे क्या होता है जब राज्य का राजा को ही अपने राज्य का हाल लेने का फुरसत नहीं है. परन्तु पृथ्वीराज को इन सबसे कोई मतलब न था, कवी चन्द्र कहते है की इस समय पृथ्वीराज बिलकुल ही कर्तव्यहीन हो गए थे. गौरी तो हमेशा ससे ही अपने अपमान का बदला लेने के लिए तत्पर रहता था, उसके दूत भेष बदल बदल कर दिल्ली नगरी में घूमा करते थे, वे हर समय का खबर अपने सुलतान के पास पहुंचाते थे. गौरी को ये समाचार बार बार मिल रही थी की इस समय पृथ्वीराज अपने राज्य का रक्षा में दंचित नहीं है, उनके राज्य में स्त्रियों की प्रधानता हुई जा रही है, और उनके कई नामी सरदार और सामंत मारे जा चुके है.मुहम्मद गौरी ने तो दरबार में ये भी कह दिया था की जब से मेरी ये हार हुई है तब से मैं ठीक से सोया नहीं हूँ., मैं हमेशा से इसी चिंता में लगा रहता हूँ की पृथ्वीराज से अपनी हार का बदला कैसे लिया जाय. दिल्ली की खबर को स्सुनकर उसने सैनिको को एकत्र करना शुरू कर दिया, थोड़े ही समय में उसने एक बड़ी सेना जुटा कर दिल्ली की ओर चल दिया.जयचंद भी इस बार मुहम्मद गौरी का साथ दिया, भारत वश का एक मात्र राजा जयचंद ही था जिसने यवनी का साथ दिया था अपने ही देश के राजा के खिलाफ, ये समय भारत वश के लिए बहुत ही दुखित कर देने वाला था, भारत का एक मात्र राजा जो उस यवनी को रोक सकता था संयोगिता की प्रेम जाल में फंसा था, और भारत में काल बनकर गौरी की सेना बरही आ रही थी ऐसे में वहां की प्रजा और सामंत घबराते नहीं तो और क्या करते.बहुत सारे पडोसी राजा ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर उनकी सुनता कौन है. यदि कोई समाचार भेजता तो वो समाचार पृथ्वीराज तक पहुँचने भी न पाता था.ये भारतवश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या था. देश का सौभाग्य के कारण पृथ्वीराज चौहान ने और देश के दुर्भाग्य के कारण संयोगिता ने जन्म लिया था. और भारत वश को इस आध्यापत में डालने का काम पृथ्वीराज के प्रेम प्रसंग ने कर दिया था. सामंत उन्हें पत्र भेज भेज कर कई तरह से समझाने की कोशिश करते, कई सामंतों ने ये प्रयत्न किया की पत्र उनके पास तक पहुंच जाए, पर रहस्यमयी तरीके से पत्र बीच में ही गायब हो जाते.फिर चंदरबरदाई ने उन्हें एक पुर्जा भेजा जिसमे लिखा था की तुम तो महल में यहाँ आनंद कर रहे हो पर मुहम्मद गौरी तुमपर आक्रमण करने यहाँ आ रहा है, पृथ्वीराज ने वो पुर्जा पढ़ा भी लेकिन झल्ला कर उसे फाड़ कर फेंक दिया और हतास होकर बैठ गए, क्योंकि उन्होंने एक दिन पहले ही भयानक स्वपन्न देखा था जो की उनकी पतन का सूचना दे रहा था. धीरे धीरे पृथ्वीराज की विलासिता का समाचार रावल के समरसिंह तक पहुँच गया. ठीक उसी समय समर सिंह ने भी एक भयानक सपना देखा था जिससे उन्हें यकींन हो गया था की भारत का पतन का समय आ चूका है.इसलिए जैसे ही उन्होंने दिल्ली का समाचार सुना वे स्वयं राज गद्दी अपने पुत्र को सौंप कर दिल्ली की ओर चल दिए.वे अपने साथ एक बहुत ही बड़ी विशाल सेना भी लेकर आये क्योंकि उन्हें पता चल गया था की गौरी भारत पर आक्रमण करने के लिए आ रहा है. जब समर सिंह दिल्ली आये तब उनकी आगवानी कौन करता पृथ्वीराज तो महल में थे,तब संयोगिता ने आदमी भेज कर उनका आदर सत्कार करवाया था. उनके आने के कई दिन के बाद पृथ्वीराज को समर सिंह के आने की खबर मिली. वे पहले तो उनसे मिलने गए फिर उन्होंने समर सिंह को विदाई देनी चाही.परन्तु समर सिंह हठ कर के रह गए. यदि कोई दूसरा राजा होता तो अपना अपमान समझ कर चला जाता लेकिन समर सिंह दूरदर्शी,बुद्धिमान,और सहनशील थे.उन्होंने अपने अपमान का चिंता छोड़ देश के हित के बारे में सोचा. जब वे पृथ्वीराज से मिलने के लिए गए तब उन्होंने बड़े ही मीठे शब्दों में बहुत कुछ समझाया, आश्वासन दिया. पर पृथ्वीराज इस समय भी हताश से हो रहे थे, चन्द्र का पत्र,स्वप्न, समर सिंह का आगमन,और ठीक उसी समय मुहम्मद गौरी का आक्रमण ये सभी बातें पृथ्वीराज को दहला रही थी. पृथ्वीराज अब अपनी करनी पर पछताने लगे थे, परन्तु अब क्या हो सकता है,कुछ भी हो समर सिंह ने तरह तरह से पृथ्वीराज को लज्जित किया. पृथ्वीराज ने समर सिंह के कहे अनुसार ही कार्य करना सही समझा. आपको याद होगा की पृथ्वीराज ने चामुंडराय को कैद कर रखा था, समरसिंह ने सबसे पहले चामुंड राय को छोड़ देने को कहा. पृथ्वीराज ने उनकी आज्ञा मान ली और चामुंड राय को छोड़ने के लिए अपने सामंतों को भेज दिया, वे चामुंडराय कके पास संक्कोच वश नहीं जा पाए, पर जब चामुंडराय नहीं माना तब पृथ्वीराज और समर सिंह स्वयं ही उनके पास गए, पृथ्वीराज ने अपने कमर की तलवार से उनके बेड़ियों को काट दिया और वो तलवार उन्हें दे दिया, इसके साथ ही उन्होंने चामुंडराय से अपने किये के लिए माफ़ी भी मांगी,इसपर चामुंडराय बहुत खुश हो गया.चामुंडराय के रिहा होने के कारण सारी दिल्ली नगरी खुस हो गयी. दुसरे ही दिन दरबार लगा और विचार होने लगा की क्या करना चाहिए, सभों की सलाह से विचार ये निकला की दिल्ली का शासन भार पृथ्वीराज के पुत्र रेनुसिंह को सौंपकर युद्ध के लिए निकल जाना चाहिए. लेकिन जब समय विपरीत होता है तब सबकुछ विपरीत ही हो जाता है.इस संकट में पृथ्वीराज का एक सामंत हहुलिराय आपस की वाद विवाद के कारण शत्रु के पक्ष से जा मिला. हिन्दुओं ने सदा से ही धर्म युद्ध किया है उन्होंने कभी भी छल युद्ध नहीं किया है,इसी धर्म युद्ध के कारण पृथ्वीराज और समर सिंह अपनी सेना समेत तारायन की ओर चल दिए. वीर पत्नी संयोगिता ने आज अपने हाथों से अपने पति पृथ्वीराज को रण से सुसज्जित किया. यद्यपि उसका ह्रदय काँप रहा था,उसे स्पष्ट मालूम था की उनके पति सदा के लिया जा रहे है. उसने अपनी अधीरता किसी भी प्रकार से पृथ्वीराज को नहीं दिखाई,उसे पूरा विश्वास था की जीत आये तो ठीक वरना हम दोनों सूर्यलोक में तो अवश्य ही मिलेंगे. संयोगिता से विदा लेकर पृथ्वीराज रणक्षेत्र की ओर चल पड़े.पानीपत के मैदान में ही गौरी को रोकने का विचार ठहरा. इधर से पृथ्वीराज अपनी सेना लिए आगे बढ़े उधर से मुहम्मद गौरी आया पहुंचा.दोनों की सेना तेरायन के युद्ध स्थल में जा मिली. इस समय मुहम्मद गौरी ने फिर चाल से काम लिया, उसने अपने एक दूत को भेज कर कहा की अगर तुम इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लो और अपने राज्य का कुछ अंश दे दो तो हम तुम्हे माफ़ कर सकते है. इस पर पृथ्वीराज ने बीते हुए बातों और पराजय को फिर से याद करने को कहा और लौट जाने की बात कही.उसने दूत को बहुत ही गर्वित अक्षरों में लिखा एक पत्र देकर उतर दिया. तब उसने धोखा देने के लिए ये उतर लिख कर भेजवा दिया की मैं तो केवल सेनापति हूँ मेरा भाई राजा है.अतः उनकी आज्ञा का पालन करने कके लिए मैं बाध्य हूँ.आप मुझे कुछ समय दे ताकि मैं उनसे लौटने का आदेश मंगवा सकूं.उनकी आज्ञा की बगैर हम लौट नहीं सकते है. जब तक उतर न आये तबतक युद्ध स्थगित रहे.इस उतर पर समरसिंह को विश्वास नहीं हुआ. इसलिए उन्होंने उसकी सेना को हमेशा प्रस्तुत रहने का आज्ञा दिया.सेना प्रस्तुत भी हुई, लेकिन शाहबुद्दीन गौरी की ओर से आक्रमण नहीं हुआ. राजपूत शत्रु बिना सावधान किये आक्रमण नहीं करते है बहुत दिनों से यही निति चली आ रही है इन्ही नीतियों के कारण राजपूतों को कई बार हार का सामना भी करना पड़ा है. इस युद्ध में पृथ्वीराज के तरफ से तिरासी हज़ार थी और मुहम्मद गौरी की ओर से दस लाख की एक विशाल सेना थी.रासो में एक कथन दिया गया है की जब कविचन्द्र ने हहुलीराय जो की पृथ्वीराज का एक सामंत था उसे समझाने के लिए गया था तब उसने कवी चन्द्र को जालपा देवी के मंदिर में कैद कर दिया था. यह युद्ध सन 1192 में हुई थी. दोनों की सेना नदी के तट पर अपने अपने स्वामियों की आज्ञा का इंतज़ार कर रही थी., समर सिंह घूम घूम कर अपने सेना में जोश बढ़ाने का काम करने लगे थे.रात हो गयी अब धीरे राजपूत सेना को मुहम्मद गौरी के भेजे हुए पत्र पर विश्वास हो गया था की यवनी सेना अभी आक्रमण नहीं करेगी. राजपूत सेना निश्चिंत होकर अपने अपने शिविरों में जाने लगी थी. गौरी ने यहाँ पर एक और चाल चली की उसने अपनी ओर आग को जला रहने दिया ताकि हिन्दुओं को लगे की गौरी की सेना वहीँ है और वो अभी आक्रमण नहीं करेगी, इसी बीच गौरी ने अपनी सेना को चुपचाप तैयार होने के लिए कह दिया. उसने अपनी सेना को अच्छी तरह प्रस्तुत कर लिया और एकदम सुबह जब रात सबसे ज्यादा घनी होती है उस समय सभी हिन्दू सेना निद्रा की गोद में थे, और कुछ नित्यक्रिया का काम कर रहे थे उस समय यवनी ने एकाएक आक्रमण कर दिया था, यद्यपि उसी अवस्था में हिन्दू सेना भी युद्ध के लिए तेयार हो गयी. धीरे धीरे घोर युद्ध होनी लगा, महाराज पृथ्वीराज और समर सिंह घोड़े में बैठकर अपनी सेना का निरिक्षण करते हुए इधर उधर चक्कर लगाने लगे. थोड़ी ही देर में बहुत ही घोर युद्ध होने लगा, कोई भी न अपना और पराया दिखने लगा. युद्ध करते करते हिन्दुओं की सेना का बल घटने लगा. युद्ध करते करते पृथ्वीराज पूरी तरह से शत्रुओं के बीच जा फंसे वहां से निकलना असंभव सा लगने लगा,समर सिंह पृथ्वीराज चौहान और वीर हिन्दुओं ने शेर की तरह मुसलमान सेना में टूट पड़े, पृथ्वीराज ने अकेले ही मुसलमानों के दांत खट्टे करने लगे पर इस बार मुहम्मद गौरी एक विशाल सेना को लेकर आया था, पृथ्वीराज चौहान मुसलमानों को एक एक कर के काटते गए और वो अपनी स्वामि की आज्ञा पाकर अपने प्राण देते गए, पृथ्वीराज इतनी बुरी तरह घिर गए थे की वहां से निकल पाना संभव न था, इसे देखकर जैतसिंह अपना घोडा लिए वहां आ पहुंचे और चालाकी से पृथ्वीराज के माथे का छत्र उतार कर अपने माथे में रख लिया, जैत सिंह ने भी बड़ी वीरता पुर्वक युद्ध की और पृथ्वीराज समझ कर यवनी ने उन्हें मार डाला, इधर पृथ्वीराज यवनी सेना से अकेले जूझ रहे थे उनकी मदद करने वाला कोई न था. आज के युद्ध में गुरुराम भी युद्ध करते करते वीरगति को प्राप्त किये, दोपहर होते होते चामुंडराय भी वीर गति को प्राप्त कर लिए. आज के युद्ध में राजपूतों ने अपनी प्राणों की ममता को छोड़ कर युद्ध करने लगे थे. उनके प्रक्रम को देखकर मुसलमान सेना भी उनकी लोहा मान लिया था, पर मुसलमान सेना ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी. आज का युद्ध में भारत हमेशा के लिए परतंत्रता की जंजीर में बंधने वाला था शायद इसलिए समरसिंह भी लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त कर गए. इधर पृथ्वीराज चौहान अब अकेले ही दुश्मनों से लड़ाई कर रहे थे उनके साथ अब केवल थोड़ी बहुत हिन्दू सेना ही बच गयी थी, उनकी शेर सी गर्जन और तलवार की खन खन सुनकर ही दुश्मनों के होश उड़ने लगे थे पर समरसिंह के मौत के बाद वो भी हताश होने लगे. पृथ्वीराज बिना रुके ही लगातार युद्ध किये जा रहे थे संध्या हो चुकी थी लेकिन आज पृथ्वीराज को रोकना उन दस लाख सेना को भी भारी पड़ रहा था, लेकिन आज का दिन पृथ्वीराज का नहीं था, वो इस तरह से चारों ओर घिर गए थे की उनका जीवित बच पाना बहुत मुस्किल हो गया था, लेकिन वो हार नहीं मानने वालों में से थे, दिन भर की थकान के बाद वो अब थकने लगे थे और कई सारे दुश्मनों की चोट खा कर वो घायल हो गए, मुहम्मद गौरी ने तुरंत उन्हें पकड़ लेने का आदेश दे दिया. इस तरह से भारत का सूर्य हमेशा के लिए अस्त हो गया.

अब गौरी ने पृथ्वीराज को पकड़ कर गजनी ले आया और उन्हें कैदखाने में डाल दिया. युद्ध के खत्म होते ही गौरी ने जयचंद और गौरी का सामना चंदवर नामक स्थान में हो गया और जयचंद को मार कन्नोज पर अधिकार कर लिया और फिर दिल्ली के कई भागों पर भी अपना अधिकार जमाना शुरू कर दिया. पृथ्वीराज ने अपने छुटकारे के लिए पहले तो बहुत उपाय किये कई बार वो वहां से भागना चाहे पर वे असफल हो गए. अंत में उन्होंने भोजन को ही त्याग दिया. शाहबुद्दीन उसे समझाने के लिए खुद ही उनके पास गया पर शाहबुद्दीन को देखते ही उनकी आंखे लाल हो गयी, और उसे देखकर कटु वाक्य कहने लगे,उन्होंने सहाबुद्दीन को बीते हुए पल को याद कराया की किस तरह से तुमने मेरे पैर में गिर कर माफ़ी मांगी और मैंने तुम्हे माफ़ किया, ये सब बातें गौरी को अछि नहीं लगी,उसने पृथ्वीराज को आदेश दिया की तुम अपनी आंखे झुका कर हमसे बात करो,पर वीर पृथ्वीराज ने अपनी आंखे नहीं झुकी. उसने उसी समय पृथ्वीराज की दोनों आंखे लोहे की गरम सलाखे से निकलवा दी. आंखे न रहने पर अब पृथ्वीराज बहुत ही दीन अवस्था में चले गए. उन्हें अब अपने किये पर पछतावा होने लगा की बिना मतलब ही मैंने कैमाश को मार दिया, कई रानियों के कारण अपने वीर सामंतों को कटवा दिया, और संयोगिता के कारण शाषण तक त्याग दिया. उन्हें अपने किये पर बहुत पछतावा होने लगा.  युद्ध के ख़तम होने के कई दिन बाद चन्द्रबरदाई किसी तरह मंदिर से निकले, और सीधे दिल्ली की ओर चले गए, वहां पर उन्होंने अपने स्वामी के बारे में सुने और बहुत दुखित हुए, अब चंदरबरदाई ने बहुत मुस्किल से किसी तरह गजनी पहुंचे वहां पर उन्होंने अपने शब्द जाल से मुहम्मद गौरी को प्रसन्न किये और पृथ्वीराज से मिलने की आज्ञा प्राप्त कर लिए. पृथ्वीराज से मिलते ही उनकी दशा को देख कर वो रो पड़े और बहुत ही व्याकुल हो उठे.पृथ्वीराज ने सारी कहानी अपने मित्र को सुना दी. उसी समय उनके मन में शहाबुद्दीन से बदला लेने का विचार उनके ह्रदय में आया. कवी चन्द्र ने गौरी को अपने वाकया जाल में फंसाया और कहा की पृथ्वीराज शब्दभेदी बाण विद्या जानते है उन्होंने बचपन में ही कहा था की ये विद्या मुझे जरुर दिखायेंगे पर इसका मौका आज तक नहीं मिला है, अब अआप भी देखे और मैं भी देख कर अपनी इच्छा पूरी करूँगा. थोड़े से तर्क वितर्क के बाद कुछ मंत्रियों ने अनुमति देने और कुछ ने न देने की बातें भी कही.परन्तु गौरी के मस्तिस्क में चन्द्रबरदाई की ऐसा कौतोहल पड़ा की उसने किसी की बात न मानी. पृथ्वीराज बहुत ही दुर्बल हो रहे थे इसलिए चन्द्र की प्राथना के बाद उन्हें कुछ दिनों तक पौष्टिक आहार दिए गए, और फिर तमाशा के लिए सब इतेजाम भी किये गए.कवी चन्द्र ने चुपचाप ही इस तमाशा का उद्देश्य पृथ्वीराज को समझा दिया गया था.कवी चन्द्र ने शहाबुद्दीन गौरी को ते बात भी बता दी थी की यदि आप आज्ञा नहीं देंगे तो पृथ्वीराज बाण नहीं छोड़ेगे क्योंकि पृथ्वीराज एक महाराज है और वो इस वक़्त आपके कैदी है इसलिए वो केवल एक महाराज की ही आज्ञा मानेंगे और किसी की नहीं.अतः बाण चलाने की आज्ञा आपको ही देनी पड़ेगी.  पृथ्वीराज चौहान को दरबार में बुलाया गया और धनुष बाण दिया गया ज्यों ही उन्होंने बाण को ताना त्यों ही वो धनुष टूट गया,पृथ्वीराज ने कहा की एक राजपूत के हाथों का बल एक राजपूत का धनुष ही सह सकता है इसलिए मुझे अपना धनुष चाहिए. पृथ्वीराज को उनका धनुष दिया गया. अपने धनुष को हाथों में पाकर पृथ्वीराज खुश. हो गए.  उन्होंने उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दी. इस वक़्त कवी चन्द्र ने अपने कविता के मध्यम से बहुत ही ओजस्वनी भाषा में खा की इस वक़्त आपके हाथ में धनुष, सामने तवा और बायीं ओर शाह बैठा है.आप अपने ह्रदय को मज्बूओत करके इस मौके को उपयोग में लाइए, पृथ्वीराज ने कहा सच ऐसा मौका फिर न मिलेगा, मैं अवश्य तुम्हारे कथनानुसार कार्य करूँगा, कालग्रस्त शाहबुद्दीन ने पृथ्वीराज को बाण चलने की आज्ञा दे दी. चरों ओर से शत्रुओं से घिरे पृथ्वीराज अकड़ कर खड़े हो गए, और शहाबुद्दीन की आज्ञा का इन्तेजार करने लगे.पहले दो तीन वार तवों पर पृथ्वीराज ने किया और फिर अगला वार शहाबुद्दीन के आदेश देते ही पृथ्वीराज ने घूमकर शहाबुद्दीन पर कर दिया. यह बाण शाहबुद्दीन के ठीक मुंह में लगा और तालू फोड़ कर दूसरी ओर निकल गया. गौरी जहाँ तहां छटपटाता और हाथ पैर पटकता हुआ रह गया. कुछ देर तक तो चारों ओर सन्नाटा छा गया लेकिन फिर हाहाकार मच गया सभी लोग उन्हें मारने के लिए दौड़ पड़े,. कवी चन्द्र ने अपनी जीत का समाचार प्रिथ्व्विराज को सुनाया और फिर चन्द्र बरदाई ने अपनी छुरी निकाल कर अपने पेट में भोंक ली और फिर उसी छुरी को निकाल कर पृथ्वीराज के हाथों में दे दी और पृथ्वीराज ने उसे अपने सीने में भिनक ली इस तरह से आत्म्हत्या कर पृथ्वीराज का अंत हुआ. अंग्रेजो ने पृथ्वीराज के मौत के बारे में लिखा है की उनकी मौत तेरायन के दुसरे युद्ध में ही हो गयी थी,जिसे बहुत बाद में भारत के प्रति सम्मान रखने वाली मुसलमान लेखिका ने गलत साबित करते हुए पृथ्वीराज और चंदरबरदाई की कब्र को  गजनी में दिखाते हुए चंदरबरदाई के लिखे पृथ्वीराज रासो को ही सच बताया है.इसके बाद कई मुसलमान शाशकों ने दिल्ली को उजाड़कर सारे भारतवर्ष में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया.

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