Maharana Pratap · July 22, 2016 1,876

उदयपुर का त्याग और कुमलमेर को राजधानी बनाना

शक्तिसिंह के निर्वासन के बाद राणा प्रताप ने सभी सामंतों और राजपूत योद्धाओं की एक सभा बुलाई और सबको एक साथ सम्भोधित करते हुए कहा की “मेवाड़ के समस्त सामंत, बहादुर, और नागरिकों आज का दिन हम सबके लिए आत्ममंथन का दिन है, संकल्प का दिन है, हम सभी जानते है की साम्राज्यवादी ताकते हम सभी को नष्ट कर हमारी संस्कृति को छिन-भिन्न कर देना चाहती है, हमारा बस अपराध इतना है की हमने किसी की अधीनता स्वीकार नहीं की है, आज पूरा भारतवर्ष विदेश से आये हुए मुस्लिम साम्राज्य के आगे घुटने टेक दिए है, हमारे राजपूताने के कई राजाओं ने भी उनकी अधीनता स्वीकार कर ली है, पर आजतक हमारे किसी भी पूर्वजों ने किसी के सामने अपना सर नहीं झुकाया है, हमारे हर पूर्वजों ने अपना सर झुकाने के स्थान में अपना सर कटाने पर विश्वास किया है. मुग़ल हमारी ताकत और राजपूतों की आन बाण और शान से भली भांति परिचित है, परन्तु राजपूतों के ख़ून में जो सबसे बड़ी कमजोरी है वो है एक दुसरे से जलना, उन्हें निचा दिखाना, और हर संभव एक दुसरे को नष्ट करना. विदेशी शक्ति सदैव से इन कमजोरियों का लाभ उठा कर राजपूतों के पीठ पर वार किया है. अपनों के साथ विश्वासघात ही समाराज्य्वादियों की जड़ों को हमारी धरती में गहराइ तक ले गयी है. इन विदेशियों से हाथ मिलाने की इच्छा इसलिए नहीं होती है क्योंकि जब जब राजपूतों ने इनसे हाथ मिलाया है हमारे घरों की स्त्रियों की मान, मर्यादा खतरे में पड़ी है, इनके सरदार जब चाहे हमारे घरों से किसी सामान की भांति हमारी घरों के स्त्रियों को ले जाते है, और आप इस बात से बिलकुल भी अनजान नहीं है की आज जो दिल्ली का राजगद्दी में बैठा शाषण कर रहा है, वो किस तरह से वहां के हिन्दू स्त्रियों को आगरा के बाजार में खुले आम बेच रहा है. इतिहस साक्षी है की, राजपूत स्त्रियाँ इनकी हवास का शिकार बनने से बचने के लिए जलती चिताओं में अपने कुंदन से सुन्दर तनो को जीवित जलाकर राख किया है, महारानी पदिमनी जैसी असंख्य राजपूत ललनाये अपनी सोने से शारीर को आग्नि में भस्म कर चुकी है, बाप्पा रावल के वंशज भीम सिंह से लेकर महाराणा सांगा तक असंख्य वीर राजपूतों ने हमारी इस धरती को विदेशियों से बचाने के लिए अपनी प्राणों की बलि दे दी है. हमें लड़ाकू कौम कहा जाता है, और हम इस बात को स्वीकार करते है की हम लड़ाकू है, और हमें इस बात पर गर्व है की हम एक लड़ाकू कौम है पर लड़ाकू होने का ये अर्थ नहीं है की हम आक्रान्ता हो जाये, अपने ही भाइयों को नीचा दिखाने और उनका हक़ छिनने से हममें और उन मुगलों में क्या अंतर रह जायेगा.
आप लोगो ने मुझे मेवाड़ का राणा बनाकर मुझपर बहुत भरी दायित्व दाल दिया है, परन्तु चित्तौड़ अभी भी उन मुगलों के अधीन है, मेरा सबसे पहला कर्तव्य यही है की चितौड़ को मुगलों से छुड़ा कर राजपूती शान को फिर से स्थापित करूँ और मुगलों को ये सन्देश पहुंचा दू की राजपूतों से टकरा कर वो भी चैन से नहीं सो सकते है राजपूत मरने से नहीं डरते वो तो युद्ध में मर कर अमर हो जाया करते है. परन्तु एक बात ध्यान रहे मैं अकेला कुछ भी नहीं हूँ, यदि आप लोगो की फौलादी ताकत मेरे साथ है तो मैं फौलाद हूँ, आज मेरे साथ साथ आपलोग भी शपथ लीजिये की जब तक हम चितौड़ को मुक्त नहीं करा लेंगे तब तक हम सब सोने चांदी के बर्तनों में भोजन नहीं करेंगे, जीवन को भोगों में नष्ट नहीं होने देंगे, हम आपसी वैर भाव, और अन्य सभी संकिर्ताओं को अपने से दूर रखेंगे, और इस तरह महाराणा प्रताप के साथ सभी योद्धाओं, सरदारों और नागरिकों ने सपथ ली. शपथ के बाद ही मेवाड़ क्षेत्र में नई हलचल आरम्भ हो गयी, राजपूतों ने सिर और मुछ के बालों को कटवाने बंद कर दिए. सादे जीवन का प्रण लेकर अपने महाराणा को हर संभव सहयोग देने लगे.
इसके साथ ही उदयपुर जैसे सुन्दर नगरी को त्याग कर, कुमलमेर की दुर्गम पहाड़ियों के बीच अपनी राजधानी बनाने का निर्णय महाराणा प्रताप और उनके विवेकशील सरदारों ने लिया. राणा प्रताप जानते थे की उदयपुर समतल स्थान में बसी नगरी है, और यहाँ भारी मुग़ल सेना कभी भी उनपर आक्रमण कर उनपर अपना अधिकार जमा सकती है, इसके साथ ही राजपूतों के संख्या कम होने के कारण पहाड़ियों के बीच उन्हें लड़ना सदैव से अनुकूल रहा है. देखते ही देखते उदयपुर वीरान हो गया, और महाराणा के इशारे में उदयपुर निवासी कुमलमेर में जाकर बसने लगे. राणा प्रताप ने उदयपुर छोड़ने का आदेश इतनी शक्ति से दे रखा था की जो भी उदयपुर की सीमा में प्रवेश करता उसे मृत्यु दंड दिया जाता. कुछ ही समय में कुमलमेर आबाद और उदयपुर आजाद हो गया. कुमलमेर में आराम का जीवन नहीं था, कठोर जीवन देकर महाराणा प्रताप अपने नागरिकों को ये एहसास दिलवाना चाहते थे की उनका जन्म भोग-विलास के लिए नहीं बल्कि अपनी धरती को मुगलों से आजाद करवाने के लिए हुआ है. महाराणा प्रताप ने एक विशाल किला कुमलमेर में बनवाया, और सुरक्षा का पूरा इंतजाम किया. राजपूत युवकों को युद्ध करने का अभ्यास करवाया जाता था, अपनी मातृभूमि में मर मिटने के लिए तैयार रहने का मनोबल दिया जाता था. स्त्रियाँ भी अपने भाइयों, बेटों और पत्तियों को उनकी तैयारी में पूरा सहयोग करती. मेवाड़ की समस्त प्रजा अपनी आय में से कटौती कर सुरक्षा व्यवस्था के लिए धन जूटा कर देती, जन जन में महाराणा प्रताप ने ये मन्त्र फूंक दिया था की, ना कोई राजा है न ही कोई प्रजा है, जब तक हम अपनी खोई हुई जमीन वापस नहीं ले लेते तब तक हम चैन से नहीं बैठ सकते है. राणा प्रताप में मुगलों से अपनी मातृभूमि लेने का लक्ष्य था वही उनके दोनों भाइयों ने उन्हें बहुत निराश किया. उनका छोटा भाई जगमाल जिसे हटा कर प्रताप को राणा बनाया गया कभी चैन से नहीं बैठा, राणा प्रताप ने बहुत कोशिश की कि जगमाल को पूरी प्रतिष्ठा दी जाय पर जगमाल उनसे हमेशा असंतुष्ट और नाराज ही रहता वो अपने आप को अपमानित समझता. वो अधिक दिन तक मेवाड़ में नहीं रह सका और उसने मेवाड़ त्याग कर अपने परिवार समेत जहाजपुर चला गया. जहाजपुर आज्मेर के सुबेदारी की अधीन था. अजमेर के सूबेदार ने उसकी रहने की व्यवस्था कर दी. कुछ दिन बाद जगमाल अकबर से मिला. अकबर विस्तारवादी था वह हमेशा से राजपूतों को अपने साथ मिला कर उन्हें अधीन करना चाहता था. वह जनता था की पुरे भारतवर्ष में राजपूत कौम ही सबसे बहादुर और लड़ाकू है, इसलिए ये कौम जिसके पक्ष में रहेगी वही भारत में राज कर पायेगा. उसे पता लगा की राणा प्रताप का भाई उसकी शरण में आया है, जिसे राज गद्दी से हटाकर प्रताप मेवाड़ का राजा बना है. तो उसे हार्दिक प्रसन्नता हुई. जगमाल के पिता उदय सिंह से चितौड़ का किला छींनते समय वो राजपूतों के बहुबल से परिचित हो चूका था, उसके विशाल मुग़ल सेना ने मुट्ठी भर राजपूतों से चितौड़ का किला जितने में छ: महीने का वक़्त लगा था.
अब राणा प्रताप का छोटा भाई जगमाल उसके सामने खड़ा था, वह प्रताप से घृणा करता था, ऐसे व्यक्ति को शरण देकर अकबर राजपूतों की एकता की कमर तोड़ देना चाहता था. इसलिए उसने जगमाल का स्वागत किया और उपहार स्वरूप जहाजपुर का परगना दे दिया. जगमाल ने अकबर को वचन दिया की वह सदैव अकबर की अधीनता में रहेगा और यथा संभव सहयोग देगा. उसी समय एक घटना और हो गयी सिरोही राज्य के उत्तराधिकार को लेकर देवड़ा सुरतान और देवड़ा बीजा में टन गयी, दोनो को ही अपनी शक्ति में भरोसा नहीं था इसलिए वो सम्राट अकबर के मित्र राय सिंह के पास पहुंचे. राय सिंह ने दोनो की बात सुनी और फिर देवड़ा सूरतान का पक्ष ले लिया, उसने सुरतन से शर्त रखी की वह सिरोही का आधा राज्य अगर अकबर को दे दे , तो वह उसकी सहायता करेगा. सुरतान तैयार हो गया. उसने आधा सिरोही राज्य अकबर को दे दिया. और अकबर ने तुरंत ही वह सिरोही राज्य जगमाल को दे दिया. राव सुरतान को ये बात बहुत बुरी लगी, उसने जगमाल को चुनौती दे डाली, परन्तु देवड़ा बीजा उसके उसके साथ हो गया और राव सुरतान का शक्ति संतुलन बिगड़ गया.उसे सिरोही छोड़ना पड़ा.वह भाग कर आबू चला गया. बाद में देवड़ा बीजा ने जगमाल का साथ छोड़ दिया अब जगमाल अकेला पड़ गया. राव सुरतान ने मौका देख कर जगमाल पर आक्रमण कर दिया. इस युद्ध में जगमाल मारा गया. रायसिंह की भी इस युद्ध में मृत्यु हो गयी.
अकबर की कूटनिति ये थी की वह राजपूतों को अपने अधीन करके उनके बल पर पुरे भारतवर्ष पर शाषण करना चाहता था, अपनी इस योजना को पूरा करने के लिए वह राजपूतों पर सदैव दबाव बनाये रहता था, उन्हें आपस में लड़ा कर नष्ट करने से भी वह कभी नहीं चुकता था, वह राजपूतों की कमजोरियों को अच्छी तरह से समझ गया था, इसी कारण से उन्हें एक एक कर के झुकाने और बर्बाद करने में सफल रहा. सिरोही का आधा राज्य देवड़ा सुरतान से लेकर जगमाल को देने के बाद अकबर ने अपना पल्ला झाड़ लिया और राजपूतों के बीच लड़ने के लिए हड्डी फेंक दी, सिरोही का राज्य उनकी आपसी फूट को हवा देने का माध्यम बन गया. राजपूतों के आपस में अनेक युद्ध हुए और जगमाल, रायसिंह और व कोलिसिंह आदि अनेक राजपूत योद्धा अकबर के मकसद को पूरा करने में काम आये
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