Prithviraj Chauhan · July 23, 2016 4,266

खजाने की खोज

रासो में लिखा है की पृथ्वीराज चौहान को एक बहुत बड़ा खजाना हाथ लगा था जिसे निकलने में समर सिंह ने पृथ्वीराज की मदद की थी। एक बार पृथ्वीराज चौहान दिल्ली से अजमेर जा रहे थे तब उन्हें खट्टू वन में एक सुन्दर सा तालाब दिखा उस तालाब में एक सुन्दर सी मूर्ति थी उस मूर्ति के माथे में लिखा था “सिर कटे धन संग्रेहे, सिर सज्जे धन जाए” यह लिखावट देखकर पृथ्वीराज को बहुत आश्चर्य हुआ, उन्होंने अपने चतुर मंत्री कैमाश से इसका मतलब पूछा। कैमास बहुत ही बुद्धिमान पुरुष था, उसे पता था की सायद यहाँ खजाना है और इसे निकालने में वक़्त लगेगा जिससे की कहीं गौरी फिर से कहीं अकर्मण न कर दे, उसने उसी समय इसका मतलब समझाते हुए कहा की यहाँ पर एक खजाना छुपा है अगर आप इसे निकलवाना चाहे तो रावल समरसिंह को बुलावा भेज दे, कैमाश के कहे अनुसार समरसिंह को बुलाने के लिए पुएंदीर एवं अन्य सामंतों ने अनेक प्रकार के उपहार लेकर चितोड़ गए और इधर अपने घर का भेदी धर्मयन ने अपने विश्वासी दूत से मुहम्मद गौरी को ये सन्देश भेजवा दिया की पृथ्वीराज अभी धन निकलने में लगे है इसलिए आप अभी अपना अपमान का बदला ले सकते है। इधर पुएंदीर की प्राथना के अनुसार रावल समर सिंह अपनी सेना के साथ आ पहुंचे, और ठीक इसी समय गौरी ने अपने मुख्या मुख्या सरदारों के साथ आ पहुंचा, परन्तु कैमाश की बुद्धिमता के अनुसार पहले ही प्रबंध हो चूका था, पृथ्वीराज चौहान ने आगे बढ़कर गौरी का सामना किया, क्योंकि वे पहले गौरी को परस्त कर फिर धन निकालना कहते थे, यह युद्ध नागोर के पास ही हुआ था इधर समर सिंह भी पृथ्वी की मदद करने के लिए पहुँच गए, दोनों योधाओं ने जमकर युद्ध किया और मुहम्मद गौरी को फिर से बंदी बना लिया गया। यह समाचार जब गजनी पहुंचा तब वहां से गौरी को मांगने के लिए दूत आया और इसके बहुत कुछ प्राथना करने पर पृथ्वीराज ने श्रीन्गाहर नामक एक बहुत बढ़िया हाथी और बहुत सा धन देकर गौरी को छोड़ दिया और एक बार फिर अपना वीरता का परिचय दिया। इसके बाद ही धन निकालने का कार्य फिर से शुरू हुआ,इस बार पृथ्वीराज को बहुत बड़ा खजाना हाथ लग गया, इसका आधा अंश पृथ्वीराज चौहान ने समर सिंह को देना चाहा पर उन्होंने खुद कुछ भी न लेकर , अपने पास में से कुछ और मिलाकर सैनिकों में बंटवा दिया।
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