Prithviraj Chauhan · July 23, 2016 5,638

दिल्ली में आक्रमण

पृथ्वीराज के शाषणकाल में दिल्ली सुख और समृद्धि से फल फूल रही थी। मुहम्मद गौरी बार बार पृथ्वीराज पर आक्रमण करता और उसे मुंह की खानी पड़ती। मुहम्मद गौरी समझ चूका था की पृथ्वीराज चौहान से सीधे सीधे नहीं जीता जा सकता है इसलिए उसने शस्त्र युद्ध के बदले कूटनीति से कार्य करना आरंभ किया,उसने अपने कुछ आदमियों को दिल्ली में भेजकर दिल्ली में जगह जगह कोहराम मचाना शुरू कर दिया। दिल्ली की सेना जब तक उनतक पहुँचति तबतक वो लोग वहां से लूटमार कर भाग जाते और फिर दूसरी जगह लूट मार करते। दिल्ली की प्रजा का सुख दिनों दिन खोता जा रहा था, और अन्दर ही अन्दर उनमे पृथ्वीराज के प्रति दुर्भावना आती जा रही थी की हमारे महाराज कुछ नहीं कर रहे है। परन्तु सच्चाई कुछ और ही थी पृथ्वीराज हर तरह से उनकी मदद कर रहे थे। अब मुहम्मद गौरी के आदमियों ने अनंगपाल के पास जाकर फरियाद की, कि आपने अपना राज्य एक गलत और अनुपयुक्त पुरुष के हाथों में दे दिया है कृपया आप अपना राज्य अपने हाथों में वापस ले ले। पृथ्वीराज तरह तरह से अपनी प्रजा को कष्ट पहुंचा रहा है, आपकी प्रजा पीड़ित हो रही है,अतः आप वापस चलकर अपना राज पाट अपने हथिन में वापस ले ले। शाहबुद्दीन के पक्षपात धर्मयन ने कुछ लोगो को अपने साथ मिला कर अनंगपाल को ऐसा दिखाया की उन्हें लगे की पृथ्वीराज की प्रजा सही में उनसे दुखी है, अनंगपाल मुहम्मद गौरी की चाल को समझ न पाए, और उन्हें उसकी बातों पर यकीन हो गया। अनाग्पाल ने पृथ्वीराज को एक पत्र लिखकर अपना राजपाट वापस माँगा और दिल्ली राज्य छोड़ देने को कहा, परन्तु हाथ में गया हुआ राजपाट इतनी आसानी से कौन दे सकता है, पृथ्वीराज को मुहम्मद की चाल का भनक मिल गयी थी अतः पृथ्वीराज ने राजपाट लौटने से साफ़ इंकार कर दिया। अनंगपाल के तपोस्वी वन जाने पर भी उनके पास पक्षपातियों की कमी न थी, अनंगपाल ने अनायास ही थोड़ी सेना बटोर ली और दिल्ली में आक्रमण कर दी, पृथ्वीराज चौहान बहुत फेर में पड़ गए, वे सोचने लगे की एक तो अनंगपाल रिश्ते में नाना लगते है और उपर से इतना बड़ा राजपाट और इतना बड़ा राज्य तो उनका ही दिया हुआ है वे उनसे युद्ध कैसे कर सकते है। अतः पृथ्वीराज ने किले का द्वार बंद करने का आदेश दे दिया और ये भी कहा की चौहान सेना एक भी सैनिक को हाथ नहीं लगाएगी, ऐसा ही हुआ, अनाग्पाल ने पृथ्वीराज के किले में हमला किया और पृथ्वीराज किले का दरवाजा बंद कर केवल आत्मरक्षा करने लगे। लाचार होकर अनंगपाल को लौट जाना पड़ा। शाहबुद्दीन गौरी अपने कार्य साधन के लिए इस समय को उपयुक्त समझा। उसने हरिद्वार में अपना एक दूत भेजकर अनंगपाल को कुछ प्रलोभन देकर अपने साथ मिला लिया। मुहम्मद गौरी के संपर्क में अनाग्पाल की बुद्धि भ्रष्ट होती ही जा रही थी। अनंगपाल ने दिल्ली के कुछ इलाकों में अपना कब्ज़ा करना शुरू कर दिया था। अनाग्पाल एवं उनके कुछ सैनिकों की सहायता लेकर गौरी दिल्ली में आक्रमण कर दिया। इस बार यवनी सेना को आक्रमण करता देख पृथ्वीराज चौहान शांत न रह सके उन्होंने आगे बढ़कर उन्हें दंड देना उचित समझा, उन्होंने अनंगपाल का तो ध्यान ही छोड़ दिया था। मुहम्मद गौरी को दंड देने के लिए महल का दरवाजा खोल दिया गया। इस बार ततार खां मुहम्मद गौरी का प्रमुख सेनापति बनकर आया था।पृथ्वीराज ने अपने सेना को अनंगपाल को जीवित पकर लेने की आज्ञा दी थी। बहुत ही भयानक युद्ध होने लगा। मुहम्मद गौरी के वीर सरदार मारुफ़ खां,ततार खां,खुरासान खां, आदि योद्धाओं ने अपने अपमान का बदला लेने में कोई कसर न रखी, वे इस तरह से राजपूत की सेना में टूट पड़े जैसे की भेंड के झुण्ड में मृगराज टूटता है, परन्तु जिन्हें वो भेंड समझ रहे थे वास्तव में वो शेर थे। चौहान सेना के वीरों ने मुसलमानों का इस ख़ूबसूरती से सामना किया की दुशमन अपनी शान भुलाकर अपनी औकात में आ गए,खून की नदियाँ बहने लगी, लड़ते लड़ते दोनों ओर की सेना मदमत हो गयी, परन्तु भारत में अभी मुसलमानों के शासन में विलम्ब था, पृथ्वीराज की दहाड़ और हिन्दू सेना की हुंकार सुनते ही दुश्मनों के रूह तक काँप उठे थे, वे विचलित होकर इधर उधर भागने लगे, पृथ्वीराज चौहान ने यवनी सेना में ऐसा तहलका मचाया की वो भागने को मजबूर हुए, जल्द ही मुहम्मद गौरी के सेना को हारना पड़ा। चामुंडराय ने मुहामद गौरी को पकड़ लिया और कैदखाने में डाल दिया, अनंगपाल को भी पकड़ लिया गया और पुरे सम्मान पुर्वक महल में रखा गया। पृथ्वीराज सभी कामों से निश्चिंत होकर दरबार में विराजे। सेनापति कैमाश ने मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज के समक्ष प्रस्तुत किया पृथ्वीराज ने बहुत कुछ समझा कर, और कुछ धन देकर उसे छोड़ दिया। इधर अनंगपाल ने एक वर्ष तक महल में आराम से रहे। इसके बाद अनंगपाल की रानियों ने उन्हें समझाया की आप व्यर्थ ही किसी के बहकावे में आकर अपना राजपाट सब नष्ट करने में लगे है क्या आपको दिल्ली की प्रजा को देखकर लगता है की वो पृथ्वीराज से दुखी है, अगर आपको राज करने का मन था ही तो फिर पृथ्वीराज को दिल्ली का राजगद्दी क्यों सौंपा। अनाग्पाल को उसके अपनी की बातें भा गयी, उन्हें अपने किये पर पछतावा होने लगा, और उन्हें पृथ्वीराज के सामने लज्जित महसूस होने लगी। अतः अब उन्हें दिल्ली में रहना उचित नहीं लगा और फिर बदरिकाश्रम की ओर प्रस्थान कर दिए। पृथ्वीराज ने स्वयं ही उनको बदरिकाश्रम तक पुरे सम्मान से पहुंच आये। इसी समय उनके बढ़ते प्रताप के कारण कई राजाओं ने उनके समक्ष शरणागत हो रहे थे, इनमे ही दक्षिण प्रान्त के कई नृपतिगण थे, वे उपहार के रूप में पृथ्वीराज को कई चीजे देते रहते थे। उन्होंने मिलकर कर्नाटकी नाम की एक बहुत सुन्दर कन्या पृथ्वीराज को अर्पण की। कर्नाटकी भी पृथ्वीराज के जीवन में एक अनर्थ का जड़ रही थी। इसने भी भारत में विद्वेष फ़ैलाने में कम सहायता नहीं की है इसी के कारण पृथ्वीराज के घर में फूट रूपी बीज बोया जा चूका था। पृथ्वीराज चौहान ने यहाँ पर गलती कर दी थी की इस कर्नाटकी को उन्होंने अपने महल में स्थान दे दी थी। चंदरबरदाई ने कहा है की पृथ्वीराज के बढ़ते वैभव के कारण भारत के दक्षिण प्रान्त के राजा पृथ्वीराज से भय खाने लगे थे इसलिए उन्होंने आपस में सलाह कर विद्वेष फ़ैलाने वाली यह कर्नाटकी नामकी एक बड़ी रूपवती, गान विद्या में निपुण तथा विचक्षण हावभाव संपन्न रमणी पृथ्वीराज को अर्पण की। अभी कर्नाटकी की अवस्था छोटी थी अतः पृथ्वीराज ने कल्हण नाम के नटके को सौंप दिया और कह दिया की इसे गान-नृत्य की शिक्षा में निपूर्ण कर दिया जाए। वैश्या की पुत्री होने के कारण वह इन सब को आसानी से समझती थी, वह शीघ्र ही इन सब में निपुण हो गयी और मौका देखते ही कल्हण ने इसे पृथ्वीराज को सौंप दिया, पृथ्वीराज ने उसकी योवन अवस्था को देखकर महल में डाल लिया।
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