Maharana Pratap · July 22, 2016 3,716

महाराणा प्रताप का संघर्षपूर्ण जीवन

अकबर लगभग पुरे मेवाड़ पर अपना अधिपत्य जमा चूका था. और राणा प्रताप के पास बहुत बड़ी चुनौती थी. पर राणा प्रताप ने इस चुनौतीपूर्ण कार्य को भी बड़ी ही सरलता के साथ पूरा करते गए, एक एक करके महाराणा प्रताप ने अपनी मातृभूमि को मुगलों के चंगुल से स्वतंत्र कराते गए. जब ये बात अकबर को पता लगी तो उसे जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि हल्दीघाटी के इस विशाल युद्ध में जिस तरह से प्रताप और उनके वीरों ने अपना शोर्य दिखाया था उससे तो ये स्पष्ट ही था की मेवाड़ में मुग़ल सेना ज्यादा दिन तक टिक नहीं सकती है. अतः मेवाड़ को जीतने के स्थान में अकबर ने सदा राणा को पकड़ने के लिए दबदबा बनाये रखा. राणा के बहादुर साथी और भील सदा ही उनकी रक्षा अपने प्राणों पर खेल कर करते रहे. उन दिनों आगरे के किले में नौ रोज का मेला लगा करता था. उस मेले की विशेषता यह थी की उसमे केवल स्त्रियाँ ही भाग लेती थी. भारत के विभिन्न हिस्सों की विशेष चीजे इस मेले बिक्री के लिए आती थी. परन्तु बेचने और खरीदने वाले पुरुष नहीं होते थे, स्त्रियाँ ही इस मेले का सारा दायित्व संभालती थी. मुग़ल सम्राट अकबर ही एक मात्र ऐसा पुरुष था, जो इस मेले में घूमने के लिए स्वतंत्र था. इस समय तक अपनी आपसी फूट और कमजोरियों के कारण प्रायः सभी राजपूत राजा अपने छोटे छोटे राज्यों को मुग़ल सामराज्य के अधीन कर चुके थे और अकबर के प्रति दासता के भाव में उनमे हीनता उत्पन्न कर दी थी. प्रति वर्ष इस मेले में अनेक राजपूत स्त्रियों का मान हनन होता था. राजपूतों में अनेक बार इस मेले को लेकर चर्चा हो चुकी थी, परन्तु वे इस मेले को लेकर खुल कर आलोचनाएं नहीं कर पाते थे. इसे बंद कराने की इच्छा हर राजपूत को थी पर इसे बोलने का साहस कोई नहीं जुटा पता था. एक बार सम्राट अकबर ने दरबार के कवि महाराज पृथ्वीराज की पत्नी जोशाबाई के साथ मेले में अभद्र व्यवहार करने का प्रयत्न किया, वह सतिव्रता स्त्री ये सब सहन ना कर सकी और उसने पूरी घटना अपने पति को बताने के बाद रात में आत्महत्या कर ली. जोशीबाई की आत्महत्या का समाचार जंगल की आग की तरह सारे राज्पूतो में फ़ैल गया और देखते ही देखते राजपूत भड़क उठे. राजपूत के आक्रोश को समझकर अकबर चौकन्ना हो गया और उसने तुरंत ही मेले को सदा के लिए बंद करवा दिया. मेले के बंद होने से राजपूतों ने राहत की सांस ली,परन्तु सम्राट अकबर की कूटनीति, राजपूतों की शक्ति से राजपूतों को तबाह करने और मुग़ल साम्राज्य की नींव को मजबूत करने की योजना को वो पूरी तरह से समझ चुके थे. उनमे से अनेक ऐसे थे, जो मेवाड़ केसरी महाराणा प्रताप के विरुद्ध हल्दीघाटी का युद्ध लड़ चुके थे. अनेक ऐसे थे,जिन्होंने राजपूतों के एकमात्र आशा स्तम्भ महाराणा प्रताप को कमजोर करने में अकबर का साथ दिया था. जोशीबाई आत्महत्या काण्ड ने ऐसे राजाओं की आत्मा को झकझोर दिया था और वे अपने आप को अकबर को सहयोग देने और महाराणा प्रताप को हानि पहुँचाने के लिए दोषी माननें लगे थे.
उधर महाराणा प्रताप हल्दीघाटी की युद्ध में अकबर की नींद को उदा देने के बाद बिठुर की जंगलों में जा छिपे थे. उनके परिवार को उनके पास सुरक्षित बुला लिया गया था. उनकी स्थिति बहुत ही दैन्य हो गयी थी, जंगलों में मुग़ल सैनिकों से बचते बचाते वे अनेक प्रकार का कष्ट झेल रहे थे. उन्हें सबसे ज्यादा कष्ट तब होता था जब उनकी जान बचाने के लिए कोई आगे बढ़कर अपनी जान दे देता था. हल्दीघाटी की युद्ध के बाद अकबर की नींद उड़ गयी थी . उसे डर था की समस्त राजपूताने के राजपूत के दिल में कहीं राणा प्रताप के लिए प्यार और इज्जत ना पैदा हो जाये. हल्दीघाटी का रण कौशल ने प्रताप का पद ऊँचा कर दिया था, उस समय की स्थिति ऐसी हो गयी थी की राजपूताना ही नहीं बल्कि समस्त भारतवर्ष में राणा प्रताप और उनके वीर चेतक की गाथा सुने जाने लगी थी, कवि राणा प्रताप की वीरता में कविता लिखने लगे थे, स्त्रियाँ राणा प्रताप की वीरता और शोर्य के गीत गाने लगी थी, देश का माहौल में अजीब सा बदलाव नजर आने लगा था, इस बदलाव में राणा प्रताप की तरह भारतवासी गुलामी की बेड़ियों से आजाद होकर स्वाधीन होने के सपने देखने लगे थे. बच्चे मेवाड़ के पराक्रम को बड़े ही ध्यान से सुनने लगे थे, जगह जगह नाट्य रूपांतरण के द्वारा महाराणा प्रताप की शूरवीरता को दर्शाया जाने लगा और अकबर को धोखे से छलने वाला, कपटी और धूर्त बताने लगे थे. असहाय और साधनहीन महाराणा अपनी तथा अपने परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए भीलों की मेहरबानी पर दिन काट रहा था और अकबर उसे जिन्दा या मुर्दा पकड़ने के लिए भीलों की टोली को जंगल जंगल भेज रहा था. मुग़ल सैनिक महाराणा के नाम से थर्राते थे. परन्तु अकबर के आदेश के आगे विवश थे. अनेक सैन्य टुकड़ियाँ विभिन्न जंगलों में राणा प्रताप की टोह में लगी थी. राणा प्रताप की सुरक्षा के लिए भील अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिए थे. अनेक बार ऐसे अवसर भी आये की कई बार मुग़ल सैनिक टोह लेते लेते राणा प्रताप के बिलकुल ही पास आ पहुंचे और छापामार कर बस उन्हें पकड़ने ही वाले थे की सही वक़्त पर भीलों की टोलियाँ ने उन्हें आगे बढ़कर चुनौती दी. मुग़ल सैनिक के साथ मुठभेड़ में अनेक भीलों ने अपनी जाने गँवा दी और राणा प्रताप को अपने छिपने के स्थान से भाग जाने का अवसर प्रदान किया. भीलों की कुर्बानियों के कारण राणा प्रताप का मन बुरी तरह से दुखी हो गया. ऊपर से उनकी पत्नी तथा बच्चों के शारीर भूख का ताप सहते सहते सूख कर हड्डियों का ढांचा मात्र रह गए थे. मन के साथ साथ महाराणा का शरीर भी टूटने लगा था. उनकी समझ में नहीं आ रहा था की क्या करे. जंगलों में छिप कर रहने से उनकी बहरी दुनिया से संपर्क बिलकुल ही टूट गया था. उनके परिवार के अन्य सदस्यों का भार भीलों ने विभिन्न स्थानों में उठाया हुआ था. राणा तक यह समाचार बराबर पहुँच रहे थे की मेवाड़ की जनता अपने राणा पर गर्व करते है, वे अपने राणा पर अपना तन मन धन सब कुछ न्योछावर करने को तैयार है, किन्तु कंदराओं में छिप कर जनत अक सहयोग कैसे लिया जा सकता था. राजपूत जाति के बिखराव और पतन में कोई कमी नहीं रह गयी थी. स्वयं महाराणा प्रताप के भाई और भतीजे विरोधी खेमे में चले गए थे. अनेक राजपूत आकबर की अधीनता को स्वीकार कर चुके थे. इन्ही राजाओं की शक्ति के कारण अकबर ने राणा को चारों ओर से घेर रखा था. कई राजपूत राजाओं ने मेवाड़ के कई हिस्सों में अपना अधिकार जमा लिया था. लगभग पूरा मेवाड़ फिर से अकबर के अधीन हो चूका था. ऐसे में राणा प्रताप के सब्र का बाँध टूट गया. महाराणा की पत्नी ने किस तरह घास-पात एकत्रित की, उनसे कुछ रोटियां बनाई और कई दिनों से भूखे दोनों बच्चों के सामने रख दी. इतने में जंगल से एक बिलाव आया और बच्चों के आगे से रोटियां उठा के ले गया. अब किसी भी तरह से रोटियां नहीं बनाई जा सकती थी और बच्चे भूख से बिलख रहे थे. बच्चों को रोता देख पत्नी भी दुखी हो गयी.
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