Maharana Pratap · July 22, 2016 1,202

मानसिंह से अकबर की सलाह

अम्बर के राजा भगवानदास ने अपनी बहन जोधाबाई का विवाह अकबर के साथ कर दिया था, भगवानदास का पुत्र मानसिंह अकबर का परम विश्वसनीय सेनापति था. अकबर ने मानसिंह को अकेले में बुलाया और मेवाड़ में आक्रमण करने के बारे में बातचीत की. अकबर ने शब्दों को अच्छी तरह से चबाते हुए कहा की – :मानसिंह तुम जानते हो की मैं व्यर्थ में खूनखराबा नहीं चाहता और वह खून खराबा राजपूतों के विरुद्ध हो तो मुझे दुःख होता है, परंतु मेवाड़ के राणा प्रताप सिंह का भाई शक्तिसिंह दिल्ली आया हुआ है, उसे प्रताप ने निर्वासित कर दिया है, उसने बताया की प्रताप चित्तोडगढ वापस लेने के लिए मुगलों के विरुद्ध युद्ध की तैयारी भी कर रहा है”. इस पर मानसिंह ने बड़े ही आदर से कहा की ये सब राजपूतों के आपसी झगडे है, शक्ति सिंह प्रताप का भाई है उससे कुछ गड़बड़ हुई होगी और प्रताप ने उसे निर्वासित कर दिया, पर इससे ये साबित नहीं होता है की शक्ति सिंह एक गंभीर व्यक्ति नहीं है, फिर हम उसे गंभीरता से क्यों ले. इसपर अकबर ने कहा की तुम ठीक कहते हो मानसिंह परन्तु प्रताप के बारे में मैंने अन्य राजपूतों और अपने गुप्तचरों से भी सुना है वह कई लोगो में जातीय स्वभिमानता को जाग्रत कर हमसे टकराने के लिए उन्हें तैयार कर रहा है. मानसिंह ने कहा की हमें तनिक भी चिंता नहीं करनी चाहिए, प्रताप की मुट्ठीभर राजपूत सेना हमारी सागर सी विशाल सेना का कुछ नहीं बिगड़ सकती है. शत्रु को कभी कमजोर समझने की भूल ना करना मानसिंह, और जब शत्रु राणा प्रताप जैसा योद्धा हो तब तो कदापि नहीं.
मानसिंह ने कहा की राणा प्रताप के लिए आपके मन में इतनी कद्र? इस पर अकबर ने कहा की बहादुरों की कद्र करना हमारी फिदरत है. बेशक हम राणा प्रताप की बहादुरी की कद्र करते है. इतना ही नहीं हमारे मन में तो सारे राजपूत कौम के लिए इज्जत है. हम नहीं चाहते है की प्रताप हंसे टकराए और हमें राजपूतों का बेवजह खून बहाना पड़े. इसलिए कुछ युक्ति सोचो और प्रताप को समझा बुझा कर मुग़ल सल्तनत के अधीन कर लो, इसके बाद तोह सभी राजपूत खुदबखुद मुग़ल सल्तनत के अधीन हो जायेंगे, बस हमें और कुछ नहीं चाहिए.
सारे राजपूतों को झुकाकर मुग़ल सल्तनत के अधीन करने वाली बात सुन कर मानसिंह के मन इन चुभन सी होने लगी उसने अकबर कहा की आप चिंता ना करे मैं शोलापुर के विद्रोह का दमन करने जा रहा हूँ. वहां से लौटते समय मैं प्रताप सिंह से अवश्य मिलूँगा और उन्हें समझा बुझा कर माय=उगल सल्तनत से संधि करने के लिए अवश्य मना लूँगा. इतना सुनकर अकबर ने गहरी सांस ली और कहा की देखो मानसिंह मैं राजपूत कौम का परम हितैषी हूँ, मैं बेवजह राजपूतों का खून नहीं बहाना चाहता हूँ, राजपूत कौम की सुरक्षा मुगल सल्तनत से मिलकर ही रहने में है परन्तु पता नहीं क्यों प्रताप जैसे कुछ राजपूतों को ये बात समझ में ही नहीं आती है. इसपर मान सिंह ने कहा की हाँ जह्पनाह मैं प्रताप से मिलकर उन्हें अवश्य समझाऊंगा और मुझे पूरा विश्वास है की मेरी पहल कका नतीजा अवश्य ही निकलेगा. इतना कहकर मानसिंह वहां से चला गया. शोलापुर का विद्रोह दबाने में उसे भारी सफलता मिली. उसके आत्मविश्वास का स्तर और बढ़ गया.
शोलापुर से लौटते समय वे मेवाड़ के निकट से गुजर रहे थे , उनके दिल में एक अरमान उठा अब वे प्रताप सिंह से मिलेंगे और दिल्लीपति से सुलह करा उनके सल्तनत को अकबर के अधीन लायेंगे. उन्होंने अपना दूत को राणा प्रताप के पास भेजा. दूत ने राणा प्रताप से भेंट की और अम्बर नरेश का सन्देश उन्हें दे दिया. राणा प्रताप ने दूत को कहा मेवाड़ के नरेश उनके स्वागत के लिए पहुँच रहे हैं..राणा प्रताप ने मानसिंह को सम्मान पूर्वक कुमलमेर ले आये. राणा प्रताप उन दिनों पत्तों से बनी पत्तली पर भोजन करते थे. और उनकी प्रेरणा से सभी राजपूत योद्धा पत्तलों पर ही भोजन करते थे. अपने राज्य को मुगलों के अधिपत्य से मुक्त कराने का संकल्प लेकर वे तपस्वी सा जीवन जी रहे थे पर इसके बावजूद उन्होंने मानसिंह के लिए सोने चांदी की बर्तोनो की व्यवस्था की. सोने की थाली में तरह तरह की व्यंजनों को मानसिंह के पास परोसा गया. राणा प्रताप के बेटे अमर सिंह ने भोजन की व्यवस्था स्वयं कराई थी. वे सम्मान पूर्वक राजा मानसिंह से बातें कर रहे थे और भोजन की व्यवस्था के बारे में बार बार पूछ रहे थे. भोजन परोसे जाने के बाद अमर सिंह ने निवेदन किया की महाराज आप भोजन प्रारंभ कीजिये. मान सिंह ने द्वार की ओर देखा और बोले-“तुम्हारे पिता अभी तक नहीं पहुंचे है..क्या वे हमारे साथ भोजन नहीं करेंगे.. अमर सिंह ने अपनी नजरें झुका ली और बोला-“आप भोजन आरंभ कीजिये राजा साहब, पिताजी ने सन्देश भिजवाया है की राजा साहब को आदरपूर्वक भोजन कराया जाए. वो किसी कारन से यहाँ आने में असमर्थ है. राजा मानसिंह ने चौंक कर कहा की आखिर ऐसा कौन सा कारण उपस्थित हो गया है की तुम्हारे पिता हमारे साथ भोजन के लिए नहीं पहुँच पा रहे है….मुझे इसका जवाब चाहिए नहीं तो मैं भोजन नहीं करूँगा. आप बुरा ना माने महाराज आप हमारे अतिथि है आप भोजन आरंभ कीजिये- अमर सिंह ने हाथ जोड़कर विनर्मता पूर्वक कहा. पिताजी के सर में दर्द हो गया है वो भोजन के बाद आपसे अवश्य मिलेंगे. इसपर मानसिंह एकाएक चीखे और कहा अपने पिता से जाकर कह दो की मैं उनके सर में दर्द का कारण जान चूका हूँ अगर वो अभी यहाँ आकार मेरे साथ भोजन में सम्मिलित नहीं हुए तो उनके सर में दर्द का उपचार मैं अच्छी तरह से जानता हूँ और उनका समुचित उपचार अवश्य करूँगा.अमर सिंह ने फिर से विनती की आप भोजन कीजिये महाराज..इसपर मानसिंह क्रोधित हो गए और कहा की आज प्रताप सिंह ने मेरे साथ जैसा व्यव्हार किया है ऐसा व्यवहार क्या किसी राजपूत को शोभा देता है. ठीक उसी समय राणा प्रताप अपने प्रमुख सरदार के साथ राणा प्रताप वहां आ पहुंचे. राजपूतों को क्या शोभा देता है, क्या नहीं इसका फैसला आप कब से करने लगे राजा मानसिंह? प्रताप सिंह आप मेरा अपमान कर रहे है. नहीं राजा मान सिंह राणा प्रताप किसी का अपमान नहीं करते है.. परन्तु आप जैसे राजपूत के साथ भोजन करना मैं अपने प्रतिष्ठा के विरुद्ध समझता हूँ. राणा प्रताप ये मत भूलों की तूम किसके साथ बात कर रहे हो.जनता हूँ राजा साहब मैं अम्बर के महाराजा मानसिंह के साथ बात कर रहा हूँ. ये वही महाराजा मानसिंह है जिनके पिता ने अपनी बहन मुग़ल सम्राट अकबर के साथ ब्याह दी, ताकि मुग़ल के को से बचा सके और मुगलों के रिश्तेदार बनकर युद्ध के खतरे से मुक्त हो जाये..मैं ये भी जानता हूँ की राजा मानसिंह अकबर के चहेते मुग़ल सेनापति है…उनके अधीन कई लाख सैनिकों वाला विशाल लश्कर है, वे चाहें तो पलक झपकते ही मेवाड़ की ईट से ईट बजा सकते है. मुग़ल सेना को लेकर राजपूतों की मान मर्यादा को रौंद सकते है. यह जानते हुए भी तुम्हारी इतनी हिम्मत कैसे हुई की तुमने मुझे घर बुला कर मेरा इतना अपमान किया. जिसे आप अपना अपमान समझ रहे है राजा मान सिंह वह केवल आपको स्मरण करने के लिए था की आपने इस मिटटी के साथ विश्वासघात किया है.. अपने मातृभूमि को मुगलों के हाथों बंधक्ल रखते तुम्हे तनिक भी लज्जा नहीं आई.. आपने राजपूत के घर जन्म लेकर राजपूती शान को कलंकित किया है…राजपूत वह कौम है, जो भरण-पोषण देने वाली अपनी जन्मभूमि को अपनी माता मानती है और हर कुर्बानी देकर उसकी रक्षा करती है …पर आप जैसे राजपूत ने अपनी गर्दन बचाने के लिए अपनी माँ को बंधक रखना ज्यादा सही समझा… यदि अकबर से रिश्तेदारी बनाने के स्थान पर अपनी जननी जन्मभूमि की रक्षा के लिए मुगलों के खिलाफ तलवार उठा कर लड़ते लड़ते प्राणों की बलि दे दी होती तो देश की अगली पीढ़ी तुम पर गर्व करती और यदि आप जीवित बच जाते तो आज हम आपके साथ भोजन कर रहे होते और गर्व का अनुभव कर रहे होते. तुम्हारी बातों से जातीय स्वाभिमान और राष्ट्र भक्ति की सुंगध आती है राणा प्रताप सिंह यह सुंगंध मुझे भी अच्छी लगती है. काश हम भी तुम्हारी महत्वकांक्षा में सहयोगी की भूमिका निभा सकते परन्तु अब ईश्वर को मंजूर नहीं है प्रताप सिंह, अब बहुत देर हो चुकी है, अब तो हम सब का भलाई इसी में है की की हम अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए मुग़ल सल्तनत का अंग बनकर उसके साथ खड़े हो जाये.. मैं यही सत्य समझाने के लिए तुम्हारे पास आया था, की अब भी समय है एक मौका है उसे मत गंवाओ मेरी सलाह मान लो और मुग़ल के साथ संधि कर के युद्ध की विनाश लीला से बचो. अगर पूरी राजपूत जाती युद्ध में यूँ ही मरती रही तो हमारा बीज नाश हो जायेगा. अगली पीढियां पढेगी की राजपूत जाती कोई हुआ करती थी और अपने मिथ्या अहंकार और समयानुकूल सोच ना रहने के कारण वह नष्ट हो गयी. नहीं राजा मान सिंह नहीं राणा प्रताप बहुत ही बुलंद स्वर में बोले…यही तोह मुख्य अंतर है हमारी और तुम्हारी सोच में….हम तो यही बात मानते है की दुनिया में केवल वही कौम जीवित बचती है जो अपने आन बान और शान को बचाने के लिए हमेशा अपने सर को कटाने के लिए तैयार रहती है. और वे कौम मिट जाती है जो अपने अस्तित्व को बचाने के लिए शत्रुओं के सामने घुटने टेक देती है. आपने शत्रुओं के आगे घुटने नहीं टेके है लेकिन आपने शत्रुओ के हरम में अपनी बहु बेटियों तक को वास्तु की तरह उठा कर देने का अपराध किया है. भारतवर्ष के इतिहास में आपका नाम काले अक्षरों से लिखा जायेगा.. अगली पीढियां आप पर थूका करेंगी. इसपर मानसिंह चीखे और कहा की प्रताप सिंह लगता है आपकी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है, आपकी बुद्धि को ठीक करने के लिए अब एक ही रास्ता है युद्ध. अबकी बार आप ठीक भाषा बोल रहे है राजा साहब राणा प्रताप को ऐसी ही भाषा पसंद है जाओ जाकर कह दो अपने सम्राट अकबर से यदि उसे अपनी शक्ति पर इतना ही नाज है तो सेना लेकर आये अपनी और राणा प्रतापसिंह से करे दो दो हाथ. तुम्हे अपने बाहू बल पर घमंड हो गया प्रतापसिंह इसलिए मेरे बार बार सहनशीलता का परिचय देने पर भी तुमने मेरा अपमान किया है. सम्राट अकबर की बात छोड़ो मैं स्वयं तुम्हे सबक सिखाने आऊंगा और इसके लिए तुम्हे ज्यादा दिन प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी. तुम्हे तुम्हारा घमंड चूर चूर करके तुमसे पूछुंगा की एक राजपूत को घर बुला कर अपमान करने का परिणाम क्या होता है. चलो नाराजगी में हीओ सही तुम्हारे दिल में राजपूती जज्बा तो आया..जाइये और दल बल लेकर रण भूमि में शीघ्र आईये हमारी तलवारें आपका युद्ध भूमि में स्वागत करेगी. मान सिंह अपने घोड़े पर स्वर हुए और अपने घोड़े को ऐड लगा दी. राणा प्रताप मान सिंह के घोड़े को देखते रहे जब तक की वह उनके आँख से ओझल ना हो गया. फिर वो अपने सरदारों की ओर मुड़े और मुस्कुराये..चलो अब इतिहास हम पर युद्ध छेड़ने का इल्जाम नहीं लगाएगा…शत्रु स्वयं ही आक्रमण करेगा. हमें केवल प्रतिरक्षा ही नहीं करनी है, अपितु राजपूती शोर्य से ऐसा इतिहास लिखना है जिसे पढ़ते समय इतिहास हम पर गर्व करें.
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