Prithviraj Chauhan · July 23, 2016 3,445

मुहम्मद गौरी

mohammad ghori
 
पृथ्वीराज चौहान की उम्र अब सोलह वर्ष की हो चुकी थी इस समय वे नागौर के पास अट्टूपुर में शिकार खेल खेल रहे थे। इसीसमय मीर हुसैन नाम का एक गजनवी मुसलमान जो चंदरबरदाई के अनुसार मुहम्मद गौरी का चचेरा भाई था, चित्ररेखा नाम की एक वैश्या को साथ लेकर अपने साथ लेकर आ पहुंचा बात ये थी की चित्रलेखा वैश्या होने के साथ साथ बहुत ही गुणवती थी। वह सुन्दर होने के साथ साथ विणा बाजाने, गान विद्या आदि में भी बहुत निपुण थी। शहाबुद्दीन चित्रलेखा को बहुत चाहता था। शाहबुद्दीन उतना गुनी नहीं था पर मीर हुसैन गुनी होने के साथ साथ बहुत ही सुन्दर भी था, जब शाहबुद्दीन को उसके और चित्रलेखा के प्रेमप्रसंग के बारे में पता चला तो उसने उन्हें डरा-धमकाना चाहा। इसलिए मीर हुसैन, चित्रलेखा के साथ पृथ्वीराज चौहान की अजमेर नगरी आ पहुंचा। पृथ्वीराज चौहान ने जब विदेशी को अपने नगर में देखा तो उसने अपने सामंतों से विचार विमर्श करना उचित समझा, और अंत में पृथ्वीराज ने ये फैसला किया की क्षत्रिये धर्म के अनुसार शरणागत में आये हुए को ठुकराया नहीं जाता, और उन्होंने उसे आश्रय दे दिया, अतः पृथ्वीराज ने उसे अपने सभा के दाहिने ओर स्थान दिया और उसे बहुत ही सम्मान भी दिया। चन्द्रबरदाई के अनुसार पृथ्वीराज से गौरी के बैर का कारण यही था, लेकिन अन्य इतिहासकारों की माने तो गौरी भारत केवल लूट मार करने के लिए आया था उन्होंने किसी भी वैश्या के बारे में कोई जिक्र नहीं किया है। अगर चन्द्रबरदाई का कारण सही है तो ये बात माननी पड़ेगी की एक वैश्या के कारण घोर अनर्थ हो गया। शहाबुद्दीन ने अपने भाई के पीछे एक गुप्त भेदिया भी चोर रखा था ताकि वो ये जान सके की भारतवासी उसके साथ कैसा बर्ताव करते है, उसके गुप्तचर ने देखा की पृथ्वीराज चौहान उसे बहुत इज्जत के साथ रखा हुआ है, और ये सारा हाल मुहम्मद गौरी को जाकर सुना दिया, ये सुनते ही उसने अपने सरदारों के साथ विचार करने लगा, ये सुनकर उसने अपने एक सरदार ततार खां को अजमेर भेज दिया, और कहलवा दिया की अगर तुम चित्रलेखा को लौटा देते हो तो तुम देश में आकर रह सकते हो, ततार खां ने मीर हुसैन को बहुत समझाना चाहा पर वो एक नहीं माना, अंत में वो हार मानकर पृथ्वीराज को मुहम्मद गौरी का वो पत्र दे दिया जिसमे लिखा था की “ तुम मीर हुसैन को अपने राज्य से निकाल दो वरना मैं तुम पर आक्रमण कर दूंगा, इतना सुनते ही पृथ्वीराज चौहान के साथ साथ सारे सामंत क्रोधित हो उठे और एक स्वर में कह उठे “शरणागत को त्यागना क्षात्र धर्म के विपरीत है, मुहम्मद गौरी जो चाहे कर ले हम मीर हुसैन को नहीं निकल सकते है “। आखिर का उस ततार खां को लचर होकर वहां से जाना पड़ा। वह गजनी पहुँच कर सारा हाल गौरी को सुनाया, इतना सुनते ही गौरी ने अपने सभी सरदारों को बुला भेजा और पृथ्वीराज से अपने अपमान का बदला कैसे लिया जाए इस पर विचार विमर्श होने लगा। ततार खां ने भारत पर आक्रमण करने की राय दी पर इस पर खुरासान ने ये राय दी की हम भारत को जानते नहीं है इसलिए इस समय अकर्मण करना उचित नहीं होगा क्योंकि शत्रु को जाने बगैर युद्ध करने में कोई बुद्धिमानी नहीं है, इतना सुनते ही उसके दूत भी बोल उठे की हाँ ये बात सत्य है क्योंकि पृथ्वीराज, उसके सामंत और उसके सैनिक कोई साधारण पुरुष नहीं है, गौरी कुछ देर तक शांत बैठा रहा फिर अपने दूत से बोला तुम तो भारत गए हो न तुम मुझे भारत के बारे में बताओ, दूत ने उसे भारत के बारे में बटन शुरू किया की संसार में भारत जैसा कोई दूसरा देश नहीं है, यहाँ सुन्दरता का भंडार है,यहाँ की भूमि उर्वरता से भरी पड़ी है, यहाँ में कई महल है जिसकी सुन्दरता का वर्णन मैं बोल के नहीं कर सकता है, यह देश जन, संपत्ति और वैभव से भरी पड़ी है, इसपर गौरी ने कहा की तब तो ये देश धर्म प्रचार के लिए बहुत ही सही है,इतना कह कर वो चुप हो गया, इसके बाद उस दूत ने कहा कि मैं लगभग आधा भारत घूम चूका हूँ मैंने कोई भी तीर्थ स्थल नहीं छोड़ा है, पर वहां एक बात मुझे देखने को मिली है की वहां पर हिन्दू समाज कई भागों में बंटा हुआ है ब्राह्मण, क्षत्रिय, शुद्र आदि मैं सबसे मिला पर वो सब अपने काम में अद्भुत है,अगर मैं दूसरी शब्द में कहूं तो भारत एक जन्नत है, इसपर गौरी ने कहा की तो फिर उस जन्नत से लौट क्यों आये? इसपर उस दूत ने कहा की मैं तो बस यहाँ पर आपको रास्ता दिखाने के लिए आया हूँ बिना मुश्लिम धर्म के प्रचार किये उस देश की उन्नति नहीं हो सकती है। पर ये बात है की हिन्दुओं की सकती असीमित है उन्हें पराजय नहीं किया जा सकता, वहां की प्रजा तो अपने राजा के प्रति इतनी भक्त है की उसके एक आदेश से वो जहर तक पी लेते है अतः आप हिंदू को कमजोर न समझे इतना कहकर वो दूत शांत हो गया। गौरी ने कहा की मानता हूँ की ये सब ठीक है पर हिन्दुओं में जितनी वीरता है उतनी ही उनमे फूट भी भरी पड़ी है, इसलिए मैं इन बैटन पर विचार नहीं कर सकता, विचार करने की बात तो ये है की कासिम ने केवल बीस वर्ष की उम्र में ही हिन्दुओं पर विजय प्राप्त की थी। महमूद ने भारत पर अठारह बार आक्रमण किया तब हिन्दुवों की ताकत कहाँ चली गयी थी,उनके पास ताकत अवश्य थी पर कुसंगत और कुविचार उनमे उस समय भी भरी पड़ी थी, कासिम में जब देवलपूरी पर आक्रमण किया था तब हिन्दुओं ने कहा था की जब तक उनके मंदिर पर ध्वजा लहराती होगी तबतक उन्हें कोई नहीं हरा पायेगा,कासिम ने सबसे पहले उस ध्वजा को ही काट दिया और तब हिन्दुओं ने ये सोच लिया की अब उनकी हर निश्चित है और बिना परिश्रम के ही कासिम ने उनपर विजय प्राप्त कर ली थी, इतिहास से ये साबित होता है की हिन्दोवों को हराया जा सकता है और और भारत में मुसलमान धरम प्रचार संभव है। इसके बाद गौरी ने अपने सभी सरदारों की सहमती ली और इस्लाम धर्म के प्रचार हेतु भारत पर आक्रमण करने का फैसला लिया गया।
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