Maharana Pratap · July 22, 2016 5,114

वीर शिरोमणि:-महाराणा प्रताप का बाल्य जीवन

सिसोदिया वंश के सूरज राणा प्रताप का जन्म 9 मई,सन 1540 (विक्रमी संवत 1597, जयेष्ट सुदी 3, रविवार) को अपनी ननिहाल पाली में हुआ था. उनके पिता राणा उदय सिंह एक महान योद्धा थे. महराणा उदय सिंह की जीवन रक्षा की कहानी पन्ना धाय से जुडी हुई है, उदय सिंह के पिता राणा रतन सिंह के मृत्यु के पश्चात उदय सिंह के बड़े भाई विक्रमादित्य ने राजगद्दी संभाली. विक्रमादित्य अभी थोड़े छोटे थे इसलिए उनकी देखरेख का जिम्मा बनवीर को दिया गया, लेकिन थोड़े ही दिन में बनवीर के मन में राजगद्दी हथियाने के इच्छा जागृत हो गयी. उसने कुछ सामंत को अपने में मिला लिया और जो सामंत उनके विरुद्ध गए उनकी हत्या कर दिया. उसके बाद उसने विक्रमादित्य को भी मार डाला, और फिर चल दिया मेवाड़ के एकलौते वरिश उदय सिंह की हत्या करने. उस समय उदय सिंह सो रहे थे और हाथ में नंगी तलवार लिए बनवीर उदय सिंह को मारने आ रहा था, अचानक से महल में हलचल पैदा हो गयी और ये समाचार पन्ना धाय तक भी पहुँच गयी, उस समय पन्ना धाय ने एक ऐसा बलिदान दिया जो की इतिहास में आज तक किसी ने न दिया होगा, उन्होंने उदय सिंह और अपने पुत्र में से उदय सिंह को चुना और अपने पुत्र को उदय सिंह के स्थान पर लिटा दिया, और उदय सिंह को फूलों की टोकरी में छिपा दिया, जब बनवीर ने पूछा की उदय सिंह कहाँ है, तो उसने अपने पुत्र को उदय सिंह बता दिया और बनवीर ने पन्ना धाय के सामने उसके पुत्र की हत्या कर दिया. पन्ना धाय ने उस फूलों की टोकरी के साथ कुम्भलगढ़ पहुँच गयी. कुम्भलगढ़ में आशा शाह देपुरा को कुंवर उदय सिंह को सौंपकर पन्ना धाय चित्तोड़ वापस चली आई, उस समय उदय सिंह की आयु केवल 15 वर्ष की थी. यहीं पर उदय सिंह ने शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने फिर जयवंताबाई से शादी की. प्रताप सिंह इन दोनों के ही पुत्र थे.
प्रताप का जन्म ही युद्ध के दौरान हुआ था, एक तरफ उदय सिंह अपनी मातृभूमि को वापस पाने के लिए बनवीर से युद्ध कर रहे थे और इसी शुभ क्षण में भगवान एकलिंग का अवतार लिए प्रताप सिंह धरती में पधारे. उनके जन्म के उत्सव में चार चाँद तब लग गए जब ये खबर आई की महाराणा उदय सिंह बलवीर को हरा वापस चित्तोड़ के किला पर अपना अध्यापत स्थापित कर चुके है, प्रताप के जन्म की उत्सव चित्तोडगढ के किला में ही बड़े धूम धाम से मनाया गया.
प्रताप के जन्म के तीन सौ साल पहले ही मुसलमान हमारी भारत माता पर अपना अधिकार जमा चुके थे पर जैसा की हम सब जानते है पूरा भारत कभी भी गुलाम नहीं रहा है उनमे से एक प्रदेश ऐसा भी था जो स्वतंत्रता की सांसे ले रहा था वो क्षेत्र था “राजपुताना”. राजपुताना भारत माता की एक ऐसा अंग था जहाँ के वीरों ने कभी भी आसानी से गुलामी का रास्ता नहीं चुना था, खासकर ये वीरता के पर्याय बाप्पा रावल के वंशज. ये वंश अपने मातृभूमि के लिए अपनी जान लगा देने वालों में से थे, और ये जाती बहुत ही विचित्र युद्ध कौशल से निपूर्ण थी, जिसका सामना करने से बड़े से बड़े सेना भी डरती थी. इस समय भारत की राजनीती व्यस्था में बहुत ही उथल पुथल हो रही थी, प्रताप के जन्म से पहले दिल्ली में मुहम्मद जल्लालुद्दीन अकबर के पिता हुमायूँ का राज था, जो की मुग़ल वंश से सम्बंधित था, उस समय एक और बड़ी ताकत हुमायूँ को बार बार चुनौती दे रहा था वो था अफगान का शेरशाह सूरी. शेरशाह शुरी ने हुमायूँ को सबसे पहले 25 जून 1539 को चौसा के युद्ध में पराजित किया और इसके बाद 17 मई 1540 में बिलग्राम या कन्नोज के युद्ध में बहुत ही बुरी तरह से पराजित कर आगरा और दिल्ली में अपना कब्ज़ा कर लिया. अभी प्रताप तीन साल के नहीं हुए थे की शेरशाह सूरी ने एक बहुत बड़ी सेना के साथ राजपूताने में आक्रमण कर दिया उसकी सेना ने कई इलाको को जीत लिया और कई घर और गाँव को तहस नहस कर दिया. उसके बाद शेरशाह सूरी ने चित्तोडगढ में आक्रमण किया उदय सिंह के पास उसकी सेना का आक्रमण का जवाब नहीं था उनके पास बहुत ही थोड़ी सेना थी इसलिए उदय सिंह ने युद्ध के बजाये कूटनीति का रास्ता चुना, उन्होंने शेरशाह सूरी के सामने अपने शस्त्र दाल दिया, उनके सारे सामंतों ने इसका विरोध किया पर उदय सिंह ने ये भरोसा दिलाया की वो समय आने पर अपना अधिकार वापस लेंगे. उन्होंने शेरशाह सूरी से संधि कर लिया जिसमे उन्हें आध मेवाड़ देना पड़ा, इसके कुछ दिन बाद ही शेरशाह शुरी की मृत्यु 22 मई 1945 को हो गयी, उस समय मेवाड़ में उदय सिंह और शेरशाह सूरी के सेनापति श्मशखान ही राज कर रहा था.
राणा उदय सिंह ने तीन विवाह क्रमशः जयवंताबाई, सज्जाबाई, भटियानी धीरबाई जी से किया था. शक्ति सिंह और सागर सिंह सज्जाबाई के पुत्र थे और जगमाल धीरबाई के पुत्र थे. प्रताप बचपन से ही बहुत ही बहादुर और अपनी वीरता दिखाकर लोगो को अचंभित कर जाते थे, वे जितने वीर थे उतने ही स्वाभाव से सरल और सहज थे. वे बहुत ही साहसी और निडर थे. बच्चों के साथ खेल खेल में ही दल बना लेते थे और ढाल तलवार के साथ युद्ध करने का अभ्यास करते थे. अपने लड़ाकू तेवर और अस्त्र-शस्त्र सांचालन में निपुणता के कारण वे अपने मित्रों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए थे. उनमे नेतृत्व के गुण इसी अवस्था में जागृत होने लगे थे. प्रताप को गुरु आचार्य राग्वेंद्र का भरपूर साथ मिला उन्हें प्रताप की ताकत और सूज बूझ को सही दिशा प्रदान किया. प्रताप भी अपने गुरु से बहुत सारी शिक्षा प्राप्त की. गुरु राग्वेंद्र ने शक्ति सिंह, सागर सिंह और जगमाल को भी शिक्षा दी.
एक बार गुरु ने उन चारों राजकुमारों को तालाब में से कमल का फूल लाने को कहा. गुरु की आज्ञा पाकर चारों राजकुमार तालाब में कूद गए और एक दुसरे के साथ पहले फूल लाने के लिए होड़ करने लगे, की अचानक बीच में ही जगमाल थक गए और डूबने लगे तब प्रताप आगे बढ़कर जगमाल की मदद किये तबतक इधर शक्ति सिंह कमल लेकर गुरूजी के पास पहुँच गए और कहने लगे मैंने सबसे पहले कमल का फूल लेके आया हूँ, गुरु जी बोले प्रताप तम्हारे आगे था पर वो अपने भाई को मदद करने के कारण पहले नहीं पहुँच सका, शक्ति सिंह का सारा हर्ष क्षण भर में ही गुम हो गया. अब गुरु जी ने कहा की अब मुझे देखना है की तुम में से सबसे अच्छा घुड़सवार कौन है ये घोड़े लो और उस टीले में जो सबसे पहले आएगा वो ही विजयी रहेगा. दौड़ शुरू होने से पहले ही जगमाल ने अपने हाथ खड़े कर लिए और कहा मैं नहीं जाऊंगा उस टीले तक मैं थक चूका हूँ, गुरु जी ने जगमाल के मुख में विलाशिता की भावना को परख लिया था इसलिए उन्होंने कहा की कोई बात नहीं जगमाल मेरे साथ ही रहेगा तुम लोग जाओ. प्रताप सबसे पहले उस टीले से लौट आये उसके बाद शक्ति सिंह और सागर सिंह सबसे आखिरी में आया. गुरु जी ने प्रताप की बहुत तारीफ की, इस पर शक्ति सिंह जलभुन गया. शक्ति सिंह भी प्रताप की तरह ही बहुत साहसी था पर प्रताप से तुलना होने पर वो हर बार हार जाता था जो की उसे पसंद नहीं था. एक बार जंगल में गुरु जी चारों राजकुमार को कुछ शिक्षा दे रहे थे की तभी एक बाघ ने शक्ति सिंह को पीछे से झपटने के लिए आगे बढ़ा, शक्ति सिंह डर से हिल भी न पाया था, गुरुवर कुछ कर पाते की प्रताप ने सामने रखा भाला बाघ के सीने में डाल दिया बाघ वही गिर पड़ा, तब शक्ति सिंह के जान में जान आई, शक्ति सिंह ने प्रताप का धन्यवाद किया और गुरु जी ने भी प्रताप की बहुत प्रसंशा की. इस तरह से प्रताप की शिक्षा पूरी हुई. राणा उदय सिंह जब भी प्रताप को देखते थे वो हर्ष उल्लास से भर जाते थे, राणा प्रताप को विश्वास था की उनके बाद मेवाड़ का भविष्य एक सुरक्षित हाथों में जाने वाला है. इसी सोच के साथ लगातार उदय सिंह गुप्त रूप से अपनी सेना को एक जुट करने में लग गए. लगभग 10 साल के लम्बे समय के बाद उदय सिंह ने अफगानों में आक्रमण करने का निर्णय लिया, वे अपने सभी राजकुमारों को किसी सुरक्षित स्थान में पहले पहुंचा देना चाहते थे पर प्रताप जो की अभी केवल 13 साल के ही थे किसी तरह उनको युद्ध की खबर हो गयी, वो इस युद्ध से कैसे अनछुए रह सकते है इसलिए अपने पिता के आज्ञा के बगैर उस युद्ध में कूद गए, थोड़े ही समय में युद्ध शुरू हो गया, और प्रताप इतनी कम उम्र में ही अपनी प्रतिभा की चमक चारों ओर बिखेरने लगे थे, इस युद्ध में कई राजपूत सिपाहियों ने प्रताप का भरपूर साथ दिए, बहुत ही मुस्किल से किसी तरह इस युद्ध में राणा उदय सिंह विजयी रहे, जब उन्हें पता चला की प्रताप भी इस युद्ध में सम्मिलित थे उनकी आँखे आशुओं से नम हो गयी और उन्होंने प्रताप को गले लगा लिया. अब सम्पूर्ण मेवाड़ में उदय सिंह का राज था. इस तरह से प्रताप सिंह की खायाति पूरे राजपूताने में फैलने लगी, मेवाड़ की प्रजा प्रताप के स्वाभाव से अत्यंत प्रसन्न रहती. क्योंकि कभी कभी प्रताप तो उनकी मदद करने में इतने खो जाते थे की वे भूल जाते थे की वो एक राजकुमार है. और इस तरह प्रताप अपने वीरता की गाथा को बिखरते हुए बड़े होने लगे. 
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