Prithviraj Chauhan · July 23, 2016 4,748

संयोगिता प्रेम प्रसंग

Sanyogita Chauhan
 
जिस समय ये समाचार जयचंद को मिला जयचंद क्रोध से पागल हो उठा। उसने तुरंत ही अपने मंत्री को सेना तयार करने की आज्ञा दी, यह समाचार सुनते ही चारों ओर सन्नाटा छा गया। जयचंद की रानी को जब ये समाचार मिला तब तब उसने जयचंद को बहुत तरह से समझाया और कहा की पहले संयोगिता का स्वयंबर कर ले बाद में पृथ्वीराज से युद्ध कर ले, क्योंकि इस समय पूरे भारत भर से नरेश उपस्थित है। ये समाचार संयोगिता को मालूम हुए। संयोगिता पहले से ही पृथ्वीराज की कृति सुनकर उन पर आसक्त हो रही थी, ये समाचार सुनकर वो बहुत दुखित हुई। धीरे धीरे उसके मन में पृथ्वीराज के प्रति प्रेम का बीज फूट पड़ा, और ये अंकुर कितनो ने ही देखा, जयचंद की रानी ने जयचंद को साडी बातें बता दी, जयचंद ने संयोगिता को बहुत समझाने की कोशिश की, परन्तु संयोगिता ने अपने सहेलियों से स्पष्ट कह दिया था की मैं दुसरे का वरण न करुँगी, दूती ने यह बात जयचंद से जा कही ये सुनकर जयचंद क्रोध से अधीर हो उठा। और जब स्वयंबर का समय आया तब संयोगिता ने द्वारपाल बने पृथ्वीराज के स्वर्ण प्रतिमा में स्वयबर हार डाल दिया, वहां उपस्थित सभी राजा और राजकुमार अपना अपमान समझ कर तुरंत वहां से चले गए, जयचंद ये देख कर उसकी गुस्सा का ठिकाना न रहा और उसने राजकुमारी संयोगिता को गंगा किनारे एक महल में कैद करवा दिया अब उसने पृथ्वीराज को मारकर निश्चिंत होना ही उचित समझा औ मन ही मन सोचा की पृथ्वीराज को मार डालने से संयोगिता उसके बारे में सोचना बंद कर देगी और और विवाह के लिए राजी हो जाएगी। उस समय वो ये क्रोध के कारण भूल गया था की एक राजपूत की बाला अपने प्राण दे सकती है पर अपना हठ नहीं छोड़ सकती है। पृथ्वीराज को ये सभी खबर मालूम हुए, और संयोगिता को पाने की इच्छा उनमे बलवंत हो उठी, पर तुरंत उस समय उन्होंने कुछ नहीं किया. पृथ्वीराज के इच्छानुसार यज्ञ तो विध्वंस हो ही गया था, अब कन्नोज की सेना पृथ्वीराज पर आक्रमण करने हेतु दिल्ली की ओर अग्रसर हुई, उसने दिल्ली के सीमावर्ती इलाकों में उपद्रव मचाना शुरू कर दिया और कई क्षेत्रों में अधिकार कर गावों को लूटने लगे। जब पृथ्वीराज को ये समाचार मिला तब उसकी सेना उन गावों की तरफ अग्रसर हुई और आसानी से जयचंद की सेना को मार भगाया। रासो में लिखा है की शहाबुद्दीन की माता कितनी ही बेगमों के साथ मक्के की यात्रा करने जाती थी। वे भारतवर्ष के हांसी प्रान्त से होकर जा रही थी। इस समय हान्सिपुर में नरवाहन नामक नागवंशी सरदार सूबेदार के पद पर नियुक्त था। जब उसकी सवारी दिल्ली राज्य के सरहद के पास पहुंची तब पृथ्वीराज के सामंतों ने उसे लूट लिया, पृथ्वीराज को इसकी खबर न थी, उनके सामंत ने सब धन लूटकर बेगमों को छोड़ दिया, शाहबुद्दीन की माँ गजनी लौट आई और सारा हाल शहाबुद्दीन गौरी को बता दिया, समाचार सुनकर गौरी अत्यंत क्रोधित हुआ और एक भरी सेना लेकर पृथ्वीराज से युद्ध करने निकल पड़ा। जब सेना हांसीपुर से दस कोश की दूरी पर रह गयी तब जाकर पृथ्वीराज के सामंतों को इसकी खबर मिली, चामुंडराय ने तुरंत ही किले की घेराबंदी कर ली और कई दिनों तक युद्ध चलता रहा, परन्तु हांसी के किले में किसी भी तरह यवनी का अधिकार नहीं हो पाया एक बार फिर चौहान सेना की वीरता के कारण यवनी सेना को मुंह की खानी पड़ी। जब ये समाचार गौरी को मिला तब वह स्वयं ही एक और बड़ी सेना लेकर आया, परन्तु पृथ्वीराज और समर सिंह ने उससे युद्ध कर उसे फिर से भगा दिया।

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