Maharana Pratap · July 22, 2016 4,069

हल्दीघाटी का युद्ध-2

शहजादे सलीम मुग़ल सेना की एक टुकड़ी आगे बढ़कर महाराणा प्रताप में आक्रमण करने का निर्देश दे दिया, मानसिंह ने उसे समझाने का प्रयत्न किया परन्तु वो नहीं माना. मुगलसेना ने जैसे ही हल्दीघाटी के संकरे घाटी में प्रवेश की राणा प्रताप की सेना ने एक एक कर कई मुग़ल सेना को मौत के घाट उतार दिया क्योंकि हल्दीघाटी की प्राकृतिक बनावट कुछ इस प्रकार से थी की केवल एक बार में एक सैनिक अपने घोड़े के साथ आगे बढ़ सकती थी, इस संरचना का लाभ उठा कर राणा प्रताप के सैनिकों ने मुग़ल सेना के कई सैनिकों को मार डाला, उस समय ये देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो, ये युद्ध केवल राणा प्रताप के हाथ में ही है, परन्तु तुरंत ही सलीम ने अपने सेना को पीछे हटने का संकेत दे दिया. अब उन्हें ये समझ नहीं आ रहा था की प्रताप तक पहुँचने का कौन सा मार्ग लिया जाए, ऐसे समय में शक्तिसिंह निकलकर आया और उसने शहजादे सलीम के सामने हल्दीघाटी में सेना को प्रवेश कराने की जिम्मेदारी ली. शक्तिसिंह के मार्गदर्शन में मुग़ल सेना हल्दीघाटी के मार्ग से पहाड़ी क्षेत्र में प्रवेश करने लगी. महाराणा प्रताप ने जब ये देखा की मुग़ल सेना हल्दी घाटी के पीछे वाले रास्ते से आगे बढ़ रही है तो उन्हें ये समझते देर ना लगी की किसने उन्हें ये रास्ता सुझाया होगा. अब राणा प्रताप ने आगे बढ़कर हल्दीघाटी में ही मुगल सेना को दबोचने की रणनीति बनाई. राणा का आदेश पाते ही राजपूत नंगी तलवार लिए, मुग़ल सेना पर टूट पड़े. भीलो का समूह जहर बुझे तलवार से मुग़ल सेना का संहार करने लगी. पहले ही हमले में राणा प्रताप ने मुग़ल सेना के छक्के छुड़ा दिए, देखते ही देखते मुग़ल सेना की लाशे बिछनी लगी. मुग़ल सेना में, मानसिंह सेना की बीचोबीच था. सैयद बरहा दाहिनी ओर, बाई ओर गाजी खां बादक्शी था, जग्गनाथ कछावा तथा गयासुद्दीन आसफ खां इरावल में थे. आगे के भाग में चुना-ए-हरावल नाम का विख्यात मुग़ल सैनिक था जो की कुशल लड़ाकू माना जाता था. राणा प्रताप के सेना में बीच में स्वयं राणा प्रताप और दाहिनी ओर रामशाह तोमर तथा बाई ओर रामदास राठोड था. राणा प्रताप ने मुग़ल सेना पर अपनी सारी शक्ति झोंक दी थी, अतिरिक्त सेना के रूप में केवल पोंजा भील था, जो अपने साथियों के साथ पहाड़ियों में छिपा रहा.. शहजादा सलीम अपने हाथी पर स्वर था. जब उसने देखा की महाराणा प्रताप अपने तलवार से मुग़ल सैनिकों को गाजर मुल्ली की तरह कटता जा रहा है और मुग़ल सेना के पैर उखड़ने लगे है, तो उसने तोंपे चलने का आदेश दे दिया. तोंपो के गोले जब आग उगलने लगे तो राणा प्रताप के सेना के पास मुग़ल सेना के तोपों का कोइ जवाब ना था. उनकी ढालें, तलवारे, बरछे और भाले उनके तोपों के आगे बौने पड़ने लगे. अचानक से लड़ाई का रुख ही बदल गया और राजपूतों की लाशे बिछनी लगी. महाराणा ने राजपूत सैनकों की एक टुकड़ी को आदेश दिया की आगे बढ़कर उनकी तोपें छीन ली जाए, सैंकड़ो सैनिक अपनी जान हथेली में रख कर उन तोंपो को छिनने के लिए आगे बढ़ गए, परन्तु इसके विपरीत तोप के गोले उनगे शरीर की धज्जियाँ उड़ाने लगे. ये देख कर महाराणा को बहुत दुःख हुआ, परन्तु यह एक कडवी सच्चाई थी, तोंपो की मार को परवाह किये बगैर राणा प्रताप की सेना दुगुनी उत्साह के साथ मुग़ल सेना पर टूट पड़ी. स्वयं राणा प्रताप घाटी से निकलकर गाजी खां की सेना में टूट पड़े, जो की बहुत देर से घाटी के द्वार में कहर ढा रही थी, राणा प्रताप ने गाजी खां के सेना की परखच्चे उडा दिए, इस प्रकार मुग़ल सेना और राणा प्रताप के बीच दो दिन तक युद्ध हुआ, परन्तु कोई भी नतीजा निकल कर सामने नहीं आया. दोनों ओर से सैनिकों की लाशे बिछ गयी थी, पूरा युद्ध क्षेत्र लाशो से पट गया था. मुग़ल सेना के तोंपो से निकले गोलों ने राजपूत सेना में कहर ढाया था. संख्या में चार गुनी होते हुए भी मुग़ल सेना राजपूत सेना के सामने टिक नहीं पा रही थी. युद्ध के दौरान कई ऐसे मौके आये जब मुग़ल सेना भाग खड़े हुए, परन्तु उन्हें नया उत्साह देकर वापस युद्ध के लिए भेज दिया गया. हल्दी घाटी के युद्ध में त्तिसरा दिन निर्णायक रहा, अपने जांबाज सैनिकों के लाशों के अम्बार देखकर महाराणा प्रताप बौखला गए थे. सवानवदी सप्तमी का दिन था, आकाश में बदल भयंकर गर्जना कर रहे थे.. आज राणा प्रताप अकेले ही पूरी फ़ौज बन गए थे. दो दिन तक वो अपने परम शत्रु मानसिंह को ढूंढते रहे जो युद्ध में मुलाकात करने की धमकी दे गया था. राणा प्रताप का बहुत अरमान था की वो उससे युद्ध करे और अपना शोर्य दिखाए, परन्तु मानसिंह अपने सेना के बीचोबीच छिपा रहा. आज के युद्ध में महाराणा प्रताप ने फैसला कर लिया था की वो मानसिंह को अवश्य ढूँढ निकालेंगे, वो बहुत ही खूबसूरत सफ़ेद घोड़े चेतक में बैठे शत्रुओं का संहार करते करते मानसिंह को ढूँढने लगे. सैनिकों का सिर काटते हुए वो मुग़ल सेना के बीचो बीच जा पहुंचे. उन पर रणचंडी सवार थी, देखते ही देखते उन्होंने सैंकड़ो मुगलों की लाशे बिछा दी. महाराणा के साथ उनके चुने हुए सैनिक थे वो जिधार निकल जाते थे मुग़ल सेना में हाहाकार मच जाता था, मुग़ल युद्ध भूमि को छोड़ भागने को मजबूर हो जाते थे, मुग़ल सेना अब उनसे सीधे सीधे लड़ाई करने में भयभीत हो रही थी, महाराणा मुग़ल सेना को चीरते हुए आगे बढ़ते गए. कुछ दूर जाने के बाद एक एक कर के उनके सहायक सैनिक ढेर होते गए. अब वो मुग़ल सेना के बीचो बीच लगभग अकेले थे, तभी उनकी नजर शहजादे सलीम में पड़ गयी, सलीम एक बड़े हाथी में सवार होकर लोहे की मजबूत सलाखों से बने पिंजड़ा में सुरक्षित बैठा युद्ध का सञ्चालन कर रहा था. महाराणा ने सलीम को देखा और चेतक को उसके ओर मोड़ लिया, सलीम ने जैसे ही देखा की महाराणा उसके ओर आ रहा है उसने अपने महावत को आदेश दिया की हाथी को दूसरी दिशा में मोड़ कर दूर ले जाया जाये, जब तक वो उनके पास पहुँचते एक कुशल मुगल सेना की टुकड़ी ने उन पर जान लेवा हमला किया परन्तु महाराणा प्रताप ने सभी का वार को अच्छी तरह से बेकार कर दिया और सबको मौत के घाट उतार दिया. अचानक से महाराणा की नजर मान सिंह पर पड़ी और उसे देखते ही महाराणा का खून खौलने लगा,मानसिंह हाथी पर सवार था, उसके पास अंगरक्षकों का एक बड़ा जमावड़ा था, मानसिंह के सुरक्षा व्यूह को तीर की तरह चीरते हुए, महाराणा का चेतक हाथी के बिलकुल ही नजदीक पहुँच गया, मानसिंह को ख़त्म करने के लिए महाराणा प्रताप ने दाहिने हाथ में भाला संभाला और चेतक को इशारा किया की वह हाथी के सामने से उछल कर गुजरे, चेतक ने महाराणा का इशारा समझ कर ठीक वैसा ही किया, परन्तु चेतक का पिछला पैर हाथी के सूंढ़ से लटका तलवार से चेतक का पैर घायल हो गया, परन्तु महाराणा उसे देख ना पाए, घायल होने के क्रम में ही महाराणा ने पूरी एकाग्रता से भाला को मानसिंह के मस्तक में फेंक डाला, परन्तु चेतक के घायल होने के कारण उनका निशाना चूक गया, और भला हाथी में बैठे महावत को चीरता हुआ लोहे की चादर में जा अटका, तबतक महाराणा की ओर सभी सैनिक दौड़ पड़े, और मानसिंह महाराणा के डर से कांपता हुआ हाथी के हावड़े में जा छिपा,भला हावड़े से टकरा कर गिर गया, राजा मानसिंह को खतरे में देख माधो सिंह कछावा महाराणा पर अपने सैनिकों के साथ टूट पड़े, उसने महाराणा पर प्राण घातक हमला किये. उसके साथ कई सैनिकों ने महाराणा पर एकसाथ हमला किये जिससे महाराणा के प्राण संकट में पद गए. एक बरछी उनके शरीर में पड़ी और महाराणा लहू लुहान हो गए. उसी समय एक और तलवार का वार उनके भुजा को आकर लगी. परन्तु अपनी प्राणों की परवाह किये बगैर महाराणा लगातार शत्रुओं से लोहा लेते रहे. अपने स्वामिभक्ति दिखा रहा चेतक भी हर संभव महाराणा का साथ दिए जा रहा था, चेतक का पिछला पैर बुरी तरह से घायल हो चूका था, परन्तु अश्वों की माला कहा जाने वाला अश्व दुसरे अश्वों की तरह घायल हो जाने पर युद्ध भूमि में थककर बैठ जाने वालों में से नहीं था. झालावाडा के राजा महाराणा प्रताप के मामा ने जब ये देखा की महाराणा प्रताप बुरी तरह से घायल हो गए है, और लगातार शत्रु से लड़े जा रहे है, तब उन्होंने अपना घोडा दौडाते हुए महाराणा प्रताप के निकट जा पहुंचे, उन्होंने झट से महाराणा का मुकुट निकला और अपने सिर में पहन लिया, फिर राणा से बोले-“तुमको मातृभूमि की सौगंध राणा अब तुम यहाँ से दूर चले जाओ, तुम्हारा जीवित रहना हम सबके लिए बहुत जरूरी है. महाराणा ने उनका विरोध किया परन्तु कई और सैनिको ने उनपर दवाब डाला की आप चले जाइये, अगर आप जीवित रहेंगे तब फिर से मेवाड़ को स्वतंत्र करा सकते है, महाराणा का घोडा चेतक अत्यंत संवेदनशील था, अपने स्वामी के प्राण को संकट में देख तुरंत ही उसने महाराणा को युद्ध क्षेत्र से दूर ले गया. मन्नाजी अकेले ही मुग़ल सेना के बीच घिर चुके थे, मुग़ल सेना उन्हें महाराणा समझ कर बुरी तरह से टूट पड़े, उन्होंने बहुत देर तक अपने शत्रुओं का सामना किया परन्तु अंत में वीर गति को प्राप्त किया.
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